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राजग की कृषि मूल्य संबंधित राजनीति

कृषि मूल्यों से संबंधित सरकारी नीतियों में किसानों की जगह कहां है?
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने 2011-12 के जीडीपी सीरिज के आधार पर कृषि विकास अनुमान जारी किए हैं. इसमें यह बताया गया है कि अक्टूबर-दिसंबर 2018 तिमाही में जीवीए 14 साल के न्यूनतम स्तर यानी 2.04 प्रतिशत पर पहुंच गया है. जबकि 2017 की समान अवधि के मुकाबले इस बार कृषि उत्पादन तकरीबन तीन फीसदी अधिक रही. इससे कृषि उत्पादों की कीमतों में आई गिरावट और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार की कृषि कीमत नीतियों की नाकामी का पता चलता है. राजग सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी में लगातार बढ़ोतरी की. हालांकि, कई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि लोगों को अपनी फसल एमएसपी से 20 से 30 फीसदी कम पर बेचनी पड़ी है. अध्ययनों से यह बात भी साबित हुई है कि एमएसपी से देश के सिर्फ 20 फीसदी किसानों को ही लाभ मिल पाता है.
 
इस सरकार के समर्थक यह कहते हैं कि कृषि क्षेत्र में कीमतों को लेकर विकासशील देशों की सरकार अक्सर उलझन में रहती हैं. अधिक कीमतों से उत्पादन तो बढ़ सकता है लेकिन उपभोक्ताओं और खास तौर पर गरीबों पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है. वहीं दूसरी तरफ कीमतों में आने वाली गिरावट किसानों को परेशान करने वाली है. इससे आत्महत्या तक की स्थिति पैदा हो जाती है. इसलिए सरकारों को किफायती कीमतों और स्थानी आमदनी के बीच संतुलन बनाना होगा. यह आसान काम नहीं है. जिस तरह से किसानों के लिए कई तरह के समर्थन की योजनाओं की घोषणा सरकार ने की है, उसे देखते हुए ऐसा संतुलन बनाने में सरकार के उत्साह को कम करके नहीं आंका जा सकता. लेकिन इस उत्साह में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी दिखती है. इसका एक उदाहरण प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान है. किसी भी राज्य ने यहां तक कि भाजपा शासित मध्य प्रदेश ने भी इसे संपूर्णता से लागू नहीं किया. इस योजना के लिए जितना कम बजट आवंटन किया गया है, उससे स्पष्ट है कि भाजपा इसका इस्तेमाल सिर्फ चुनावी लाभ के लिए करना चाहती है.
 
कीमतें तय करने के तंत्र में अगर कोई बदलाव होता है तो कम से कम 70 फीसदी किसानों पर इसका गहरा असर होता है. मजबूरी में अनाज बेचना भारतीय किसानों के लिए बेहद आम है. कई बार जब बाजार में किसी कृषि उत्पाद की अधिकता हो जाती है और कोई खरीदार नहीं बचता तो उत्पादों को नष्ट करने की घटनाएं भी सामने आई हैं. वहीं जब खुदरा मूल्य आसमान छू रहे होते हैं तो किसानों को अपने उत्पाद की अधिक कीमतें नहीं मिलतीं. इन परेशानियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि कृषि क्षत्र के लिए व्यापक नीतियो की जरूरत है. भारत में मंडी व्यवस्था अब भी एपीएमसी कानून के तहत चलती है. इसमें आढ़तियों की अहम भूमिका होती है और वे अधिक कमीशन लेते हैं. इस कमीशन की दर में भी अंतर रहता है. पंजाब में यह चार फीसदी है तो दिल्ली में छह फीसदी. पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में यह दर 12 फीसदी तक भी पहुंच जाती है. इस तरह की खामी रहने से कीमतों से संबंधित कोई भी नीति सफल नहीं हो सकती. इसके बावजूद एपीएमसी कानून की जगह जो नया कानून 2017 में लाया गया है, उसमें भी शोषण करने वाले बिचैलियों की व्यवस्था को बचाकर रखा गया है.
 
ओईसीडी और इंडियन काउंसिल फाॅर रिसर्च आॅन इंटरनैशनल इकाॅनोमिक रिलेशन की 2018 में एक रिपोर्ट आई थी. इसमें यह बताया गया है कि घरेलू बाजार के लिए बनाए गए नियम, व्यापार की नीतियों और उपभोक्ता मूल्यों से संबंधित पूर्वाग्रहों की वजह से पिछले दो दशकों से किसान बोझ तले दबते जा रहे हैं. 2000-01 से 2016-17 के बीच ओईसीडी के मानकों के हिसाब से भारत का उत्पादक मदद अनुमान -14 प्रतिशत रहा है. यह वैश्विक औसत से 14 फीसदी कम है. 2014-15 से 2016-17 के बीच भारत के 70 फीसदी कृषि उत्पाद कम कीमत पर बेचे गए. इस पृष्ठभूमि में सरकार की कोई भी योजना किसानों की स्थिति में सुधार लाती नहीं दिख रही है बल्कि इन योजनाओं का इस्तेमाल चुनावी फायदे के लिए होता जरूर दिख रहा है.
राजग की कृषि नीतियों में उपभोक्ताओं का पक्ष लिया जा रहा है. इससे उसी मध्य वर्ग को फायदा हो रहा है जिसके वोट से 2014 में भाजपा सत्ता में आई थी. इसलिए उपभोक्ता मूल्यों को नियंत्रित रखना राजनीतिक तौर पर जरूरी हो जाता है. इससे शहरी क्षेत्रा में राजग खुद को आम आदमी के करीब बताएगी और वंचित ग्रामीण लोगों की समस्याओं की अनदेखी मुख्यधारा की राजनीति में जारी रहेगी.

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