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लैंगिक न्याय पर एनडीए की सोच

तीन तलाक विधेयक को पारित कराने में सरकार की जल्दबाजी को सही ठहराना एक गलती होगी
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए सरकार लोकसभा में तीन तलाक विधेयक को पारित कराके संतुष्ट दिख रही है. कई लोगों को यह कदम प्रगतिशील लग सकता है. हालांकि, सतही तौर पर इसे देखना एक गलती होगी. सरकार इस विधेयक को सेलेक्ट समिति के पास भेजने को राजी नहीं हुई. इससे पता चलता है कि सभी पक्षकारों से विचार-विमर्श की लोकतांत्रिक परंपराओं में सरकार का कितना यकीन है. सबसे अजीब बात देश के कानून मंत्री ने की. उन्होंने कहा कि 12 से कम उम्र की बच्चों के साथ बलात्कार के मामले में दोषियों को मृत्यु दंड देने के अध्यादेश पर सरकार ने बलात्कारियों से विचार-विमर्श नहीं किया. इस संदर्भ में कानून मंत्री ने तीन तलाक विधेयक की तुलना की. तीन तलाक विधेयक में इसे आपराधिक श्रेणी में लाना परेशान करने वाला है. शादी को एक सिविल कांट्रैक्ट माना जाता है. ऐसे में इसका उल्लंघन भी सिविल होना चाहिए लेकिन इस विधेयक में इसे गैर-जमानती अपराध बना दिया गया है.
 
सरकार यह कह रही है कि उसने सुप्रीम कोर्ट के 2018 के निर्णय के हिसाब से यह विधेयक लाया है. यह तर्क अपर्याप्त है. यह फैसला बहुमत का नहीं था. इसके बावजूद सरकार पर्सनल कानून के दायरे में एक अलग कानून लेकर आ रही है. अगर सरकार वाकई मुस्लिम महिलाओं के न्याय को लेकर चिंतित थी तो उसे कांग्रेस के एक सांसद द्वारा पेश किए गए निजी विधेयक पर विचार करना चाहिए था जिसमें तलाक को नियमबद्ध करने और शादी खत्म करने के लिए उचित प्रक्रिया तैयार करने की बात है. व्यापक विचार-विमर्श की महिला समूहों की मांग के बावजूद सरकार इस कानून पर आगे बढ़ती गई.
 
ऐसे में तब जब संबंधित बेंच ने बहुमत से तीन तलाक को असंवैधानिक और गैरइस्लामिक घोषित कर दिया है तो फिर फिर तीन तलाक को आपराधिक बनाने का क्या मतलब है? कई सांसदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस ओर ध्यान दिलाया कि विधेयक प्रभावित महिला के गुजारा भत्ते के सवाल पर खामोश है. इससे मुस्लिम महिलाओं की बेहतरी की सरकार की मंशा पर सवाल उठता है. आपराधिक बनाने के बजाए एक बार में दिए जाने वाले तीन तलाक को घरेलू हिंसा करार देते हुए इसे घरेलू हिंसा कानून, 2005 के दायरे में लाया जा सकता था. इससे सभी धर्मों में शादीशुदा महिलाओं को छोड़े जाने की समस्या का समाधान किया जा सकता था. इस विधेयक से मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से छोड़ा जाना तो आपराधिक हो जाएगा लेकिन दूसरे धर्म में अपनी पत्नी को छोड़ने वालों के खिलाफ कुछ नहीं किया जा सकेगा. यह गैर-मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ भेदभाव भी है और यह कानून के सामने बराबरी के सिद्धांत के भी विपरीत है.
 
अगर सरकार की मंशा लैंगिक न्याय की होती तो इन बातों पर ध्यान दिया जाता. लेकिन सत्ताधारी पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का रुख पितृसत्तात्मक ही रहा है. 1951 में भीम राव आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल तैयार किया था. संघ परिवार और हिंदुत्व से संबंधित ताकतों ने इसका जमकर विरोध किया था. एम.एस. गोलवलकर भी पर्सनल कानूनों में सुधार का विरोध करते रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन तलाक विधेयक को लैंगिक न्याय से जोड़ते हैं. लेकिन सबरीमाला को परंपरा का हिस्सा मानते हैं. एक तरह से वे यह भी कह रहे हैं कि हिंदू परंपराओं को तब भी निभाया जाएगा जब वे लैंगिक न्याय के खिलाफ भी होंगे. ऐसे में इन लोगों द्वारा लैंगिक न्याय की बात ठीक नहीं लगती. खास तौर पर जिनका ट्रैक रिकाॅर्ड गुजरात के 2002 के दंगे से जुड़ा हुआ हो. उस दंगे में मुस्लिम महिलाओं को साथ बेहद बर्बर व्यवहार हुआ था.
 
मौजूदा सरकार खुद को मुस्लिम समाज के समाज सुधारक के तौर पर पेश करती है. जबकि दूसरी तरफ वह भीड़ की हिंसा को बढ़ावा देती है जिसके शिकार मुस्लिम समाज के ही लोग ज्यादातर हो रहे हैं. अल्पसंख्यकों के बीच भय का माहौल है. लेकिन इसके साथ ही आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड की किसी भी सुधार को रोकने की कोशिश भी निंदनीय है. संबंधित समाज के बाहर से सुधार की कोशिशों को अभी रोका जाना चाहिए. इस बीच किसके पास इन सुधारों को शुरू करने का नैतिक बल है, यह देखा जाना है. लेकिन इतना तो तय है कि यह नैतिक बल मौजूदा सरकार और सत्ताधारी दल में नहीं है.

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