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घोटाले के सबक

यह कहना गलत है कि निजीकरण से बैंकों की धोखाधड़ी खत्म हो जाएगी

 
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

हाल के सालों में भारत को जिन घोटालों ने झकझोरा है, पंजाब नैशनल बैंक घोटाला उनमें एक है. पीएनबी के मामले में दो चीजें स्पष्ट हैं. पहली बात तो यह कि इस धोखाधड़ी को बढ़ावा दिया गया. ये चीजें तब होती हैं बैंक के कर्मचारी कुछ बाहरी लोगों के साथ मिलकर नियमों के परे जाकर काम करते हैं. यह उससे अलग है जिसमें बैंक ग्राहकों और करदाताओं की कीमत पर खुद अपने शेयरधारकों और प्रबंधकों को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों का उल्लंघन करते हैं. गैर निष्पादित संपत्तियां यानी एनपीए तब हो सकता है जब किसी कंपनी ने जानबूझकर बैंक के पैसे नहीं लौटाए या वह कंपनी अपने गलत निर्णयों की वजह से मुश्किल में फंस गई.

दूसरी बात यह है कि धोखाधड़ी परिचालन जोखिमों तक सीमित थी. इसका मतलब यह है कि सिस्टम और प्रक्रिया में छेड़छाड़ की गई. इसमें उधारी जोखिम शामिल नहीं है. यह फर्क महत्वपूर्ण है. खास तौर पर तब जब इन नुकसानों ने राजनीतिक रंग ले लिया है. विपक्ष ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार पर इस मामले में उंगली उठा दी है. इसके जवाब में भारतीय जनता पार्टी ने नीरव मोदी और कांग्रेस के कुछ लोगों के आपसी संबंधों का हवाला दिया है.

उधारी जोखिम के मामले में राजनीति और अफसरशाही दखल की भी भूमिका होती है. इस मामले में किसी के बदले कर्ज लिया गया. नेता और अफसर सरकारी बैंकों पर उन कर्जों को जारी करने के लिए दबाव डालते हैं जो कारोबार के लिहाज से सही नहीं हैं. परिचालन जोखिम के मामले में यह सही नहीं है. इस तरह के मामले में राजनीतिक दखलंदाजी नहीं होती और यह बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत से अंजाम दिया जाता है. मोदी को चाहे जो भी राजनीतिक संरक्षण हो लेकिन अब तक इस बात का कोई संकेत नहीं मिला कि पीएनबी को मदद के लिए राजनीतिक निर्देश मिला था.

 

इस मामले के बारे में विस्तृत जानकारी अभी स्पष्ट नहीं है. मीडिया में आई खबरों के आधार पर यह कहा जा रहा है कि पीएनबी ने मोदी की विदेशी कंपनियों को कई सहमति पत्र यानी एलओयू जारी किए. एक कर्मचारी ने बैंकों द्वारा सूचनाओं के लिए आदान-प्रदान किए जाने वाले स्विफ्ट सिस्टम में हेरफेर करके ऐसा किया. इस आधार पर मोदी की कंपनियों को देश के बाहर कर्ज मिला. 

 

आम तौर पर एलओयू 90 दिन जैसे कम अवधि के लिए जारी होते हैं. लेकिन बैंक कर्मचारी ने नीरव मोदी की कंपनी को साल भर का एलओयू जारी किया. यह नियमों के खिलाफ है. इसका मतलब यह हुआ कि मोदी की कंपनी समय पर कर्ज चुका रही थी. क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो पीएनबी के नए एलओयू विदेशी बैंक स्वीकार नहीं करते. तो क्या दिक्कत इस वजह से हुई कि मोदी ने हाल के महीनों में पैसे चुकाने बंद कर दिए? या फिर उस भ्रष्ट अधिकारी की जगह जो नया अधिकारी आया, उसने एलओयू जारी करने से मना कर दिया? इस बारे में स्पष्टता जरूरी है.

 

यह महत्वपूर्ण है कि इस बात का पता लगाया जाए कि क्या किया जा सकता है. पहले तो यह पता लगाना होगा कि कितने का कर्ज बैंक का है और कंपनी की क्या इसे चुकाने भर की संपत्ति है. इसके लिए नुकसानों का मूल्यांकन जरूरी है. क्योंकि इसके आधार पर ही नुकसानों को रोका जा सकता है. हाल के दिनों में सरकारी बैंकों के शेयरों में काफी गिरावट आई है.

 

इसके बाद यह पता लगाना होगा कि कैसे आंतरिक नियंत्रण तंत्र में सेंध लगाई गई. एक वजह यह बताई जा रही है कि स्विफ्ट सिस्टम पीएनबी के कोर बैंकिंग सिस्टम से नहीं जुड़ा हुआ था. अगर ऐसा था तो यह सवाल उठता है कि इसे आॅडिटर्स ने क्यों नहीं पकड़ा. सरकार ने तुरंत भारतीय रिजर्व बैंक को सही नियमन नहीं करने का कसूरवार ठहरा दिया. सच्चाई यह है कि नियामक की इसमें कोई भूमिका नहीं है. नियामक तब हरकत में आता है जब संबंधित बैंक धोखाधड़ी की सूचना बाकायदा उसको दे.

 

पीएनबी में जो हुआ उससे सरकारी बैंकों पर हमले फिर से बढ़ गए हैं. हमें बताया जा रहा है कि सरकारी स्वामित्व की वजह से ही इन बैंकों में यह सब हो रहा है. कहा जा रहा है कि इन बैंकों के प्रबंधकों को ऐसे धोखाधड़ी रोकने के लिए कुछ प्रोत्साहन नहीं मिलता. हालांकि, इस निष्कर्ष पर पहुंचना सही नहीं होगा कि निजीकरण बैंकों की हर बीमारी का इलाज है.

 

ये बात उन्हें और भी हास्यास्पद लगेंगी जो दुनिया भर में हुए वित्तीय धोखाधड़ियों से वाकिफ हैं. 1995 में एक धूर्त कारोबारी नीक लीसन ने निवेश बैंक बैरिंगस की लुटिया डुबो दी थी. कुछ लोगों ने निजी तौर पर नियमों की अनदेखी करके वित्तीय संस्थानों को काफ नुकसान पहुंचाया है.

 

दुनिया में कई ऐसे मामले भी आए हैं जहां निजी बैंकों ने नियमों का उल्लंघन किया और बाद में अरबों में जुर्माना चुकाया. चाहे वह लीबोर दरों में हेरफेर का मामला हो या फिर एक्सचेंज दरों में या फिर मनी लांड्रिंग, निजी बैंकों के प्रबंधकों ने इनमें बड़ी भूमिका निभाकर कर काफी पैसे कमाए हैं. क्योंकि इनसे बैंक का मुनाफ बढ़ा है और उन्हें अधिक बोनस मिला है. बैंकों में धोखधड़ी और उनकी नाकामी उनके स्वामित्व पर निर्भर नहीं है. यह सोचना खुद को धोखे में डालने जैसा होगा कि बैंकों के निजीकरण से ये समस्याएं खत्म हो जाएंगी.

 

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