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निगरानी पर सवाल और डेटा सुरक्षा

गृह मंत्रालय की हालिया अधिसूचना डेटा सुरक्षा कानून लाने की एक और वजह देती है
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

पिछले हफ्ते गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी करके सूचना प्रौद्योगिकी कानून, 2000 और 2009 के नियमों के तहत दस सरकारी एजेंसियों को किसी की कंप्यूटर के डेटा की निगरानी करने और उसे हासिल करने का अधिकार दे दिया. यह बात भी समाने आई है कि सरकार 2011 के नियमों में बदलाव करके वाॅट्सएैप और टेलीग्राम जैसे संवाद एैप्लिकेशन को भी निगरानी के दायरे में लाना चाहती है. सरकार ‘गैरकानूनी’ सोशल मीडिया सामग्री का नियमन करना चाहती है और इसके लिए विभिन्न ऐप्लिकेशन के इन्क्रीप्टेड संदेशों तक उसे पहुंच चाहिए. इस हालिया अधिसूचना के बाद बहुत हो-हल्ला हुआ. इस पर सरकार ने कहा कि वह तो संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के समय के नियम को सिर्फ लागू कर रही है.
 
2017 में के. पुट्टास्वामी मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के संदर्भ में इस अधिसूचना और आईटी कानून समेत देश के निगरानी व्यवस्था को समझने की जरूरत है. ऐसा नहीं है कि पहले से यह काम नहीं कर रही है. 2014 की एक रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में हर महीने 9,000 फोन टेप किए गए. 2013 में सरकार की सेंटर फाॅर डेवलपमेंट टेलीमैटिक्स ने बड़े स्तर पर निगरानी की परियोजना शुरू की थी. सी-डाॅट की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि यह परियोजना ‘व्यावहारिक तौर पर पूरी’ हो गई है.
 
एक ऐसे दौर में जब लोगों की जिंदगी में डिजिटल तत्व काफी बढ़ गए हैं तो कंप्यूटर और फोन किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का विस्तार बन गए हैं. सरकार खुद डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देने की बात कर रही है. ऐसे में डेटा सुरक्षा के लिए एक मजबूत कानून होना चाहिए. अभी के कानून राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सिर्फ सरकार के हितों की रक्षा करते हैं. सरकार के स्तर पर होने वाली निगरानी को भारतीय टेलीग्राफ काून, 1885 और भारतीय पोस्ट आॅफिस कानून, 1898 आधार देता है. आईटी कानून की धारा-69 अंग्रेजों के जमाने के इन कानूनों को आगे बढ़ाने का काम करती है. इसके तहत सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा, मित्र देशों से संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था और अपराध को रोकने के लिए डेटा हासिल करने का अधिकार दिया गया है.
डेटा सुरक्षा पर गठित बीएन श्रीकृष्णा समिति ने कहा है कि निगरानी का काम पुट्टास्वामी निर्णय के संदर्भ में ही होना चाहिए. निगरानी की जरूरत के संदर्भ में निजता और सुरक्षा को लेकर बहस पुरानी है. हालांकि, इस बहस में मजबूत डाटा सुरक्षा कानून नहीं होने की वजह से आम लोगों की डेटा की सुरक्षा की बात पीछे छूट जाती है. श्रीकृष्णा समिति ने डेटा सुरक्षा कानून का एक मसौदा दिया था. लेकिन अभी इसे अंतिम रूप नहीं दिया गया है. सरकार भी यह साझा करने को तैयार नहीं है कि निगरानी का काम कैसे किया जाता है. आईटी कानून में जिस तरह से अस्पष्ट भाषा का इस्तेमाल किया गया है और इसमें न्यायिक दखल की संभावना को खत्म किया गया है, उससे यह पूरी प्रक्रिया अपारदर्शी बनी हुई है. हम एक ऐसे सरकार के कार्यकाल में है जो विधायी और न्यायिक प्रक्रिया से बचते हुए कार्यकारी आदेशों के जरिए नए नियमों को लागू कर रही है.
 
निगरानी की जरूरत को लेकर अस्पष्टता होने से सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है. गृह मंत्रालय की हालिया अधिसूचना पर मचा बवाल इसका प्रतीक है. हालांकि, भारत सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कई विवादास्पद निर्णय लेती रही है. आधार परियोजना और नोटबंदी इसके उदाहरण हैं. इन निर्णयों में पारदर्शिता का अभाव स्पष्ट तौर पर दिखता है.
 
भारतीय टेलीग्राफ कानून के जमाने से लेकर अब तक संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काफी बदलाव आ गए हैं. हम पहले के मुकाबले बहुत सारे लोगों से और बहुत ज्यादा संवाद कर रहे हैं. इसमें कंप्यूटर, इंटरनेट और मोबाइल जैसी तकनीक की काफी भूमिका है. हमारे संवाद सिर्फ जरूरी कार्यों तक सीमित नहीं हैं. ऐसे में किसी भी व्यक्ति के कंप्यूटर या मोबाइल की निगरानी उसकी जिंदगी में दखल की तरह है. क्योंकि इन्हीं उपकरणों के जरिए हम न सिर्फ संवाद कर रहे हैं बल्कि पढ़ रहे हैं, खरीदारी कर रहे हैं, बैंकिंग कार्य कर रहे हैं और यहां तक की विरोध भी कर रहे हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित चुनौतियां डिजिटल क्षेत्र से भी आ रही हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सरकार इन उपकरणों में कोई भी दखल करे. ऐसे में जरूरी यह है कि भारत के पूर्ण निगरानी तंत्र की नए सिरे से समीक्षा हो और पुट्टास्वामी मामले में आए अदालती निर्णय के संदर्भ में निजता के अधिकार की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए तत्काल एक डेटा सुरक्षा कानून लागू किया जाए.

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