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कैटोविस पर्यावरण सम्मेलन में गंवाया अवसर

Avinash Persaud (apersaud@me.com) is Special Advisor to the Prime Minister of Dominica on Recovery from Maria, and Chairman of London- and Mumbai-based Elara Capital.

समानता के प्रति प्रतिबद्धता से जलवायु परिवर्तन के समाधान की मुश्किलें बनी हुई हैं
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

अविनाश प्रसाॅद
 
पोलैंड के कैटोविस में आयोजित पर्यावरण सम्मेलन में डोनल्ड ट्रंप, ब्राजील और भारत के रुख से यह स्पष्ट हो गया कि इस सम्मेलन में कोई समझौता नहीं हो सकता. ट्रंप यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि इंसान जलवायु परिवर्तन की वजह हैं. दो हफ्ते की चर्चा के बाद तकरीबन 200 देशों ने कार्बन उत्सर्जन को लेकर 133 पन्नों की नियम पुस्तिका पर दस्खत किए. इसका लक्ष्य 2015 के समझौते को लागू करना है ताकि वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री से कम पर रोका जा सके.
इसका आधिकारिक नाम कैटोविस जलवायु परिवर्तन पैकेज है. इसमें यह बताया गया है कि कैसे सदस्य देश उत्सर्जन की निगरानी करेंगे और इसे कम करने की कोशिश करेंगे. यह सवाल उठता है कि अगर उत्सर्जन लक्ष्यों में कोई कमी रह गई तो क्या होगा? लेकिन हमें इसे इस संदर्भ में समझना होगा कि उर्जा दक्षता के क्षेत्र में काफी काम हुआ है. 1990 के मुकाबले वैश्विक जीडीपी के एक फीसदी में लगने वाली उर्जा 32 फीसदी कम हुई है. उभरती अर्थव्यवस्थाओं में विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ज्यादा सुधार हुआ है. इससे यह पता चलता है कि बदलाव संभव है. असली चुनौती तकनीक नहीं है बल्कि देशों के बीच समानता के संबंधों को तय करने की है. असली चुनौती राजनीति है.
 
इसे ऐसे समझें कि दो डिग्री से कम तापमान वृद्धि लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उत्सर्जन में जितनी कमी की जरूरत है, उसे विश्व की कुल आबादी के आधार पर बांटकर हर देश को उसका लक्ष्य दे दें. कई विकसित देशों में भारी औद्योगिकरण की वजह से उन्हें काफी अधिक कटौती करनी होगी. इससे उनकी जीडीपी में कमी आएगी. वहीं उभरती अर्थव्यवस्थाओं के पास विस्तार का अवसर होगा. अगर हम देशों के बीच इस स्टाॅक सीमा का व्यापार शुरू कर दें तो अमीर से गरीब देश की ओर धन जाएगा. हम एक समस्या का समाधान करके दूसरी समस्या को भी सुलझा पाएंगे.
 
दूसरी स्थिति यह हो सकती है कि हम दो डिग्री से कम तापमान वृद्धि के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुल नए उत्सर्जनों को वैश्विक आबादी के आधार पर देशों में बांट दे और उनका लक्ष्य तय करें. इससे बढ़ती आबादी वाले गरीब देशों को उर्जा इस्तेमाल में कटौती करनी पड़ेगी और घटती आबादी वाले अमीर देश फायदे में रहेंगे. हम जलवायु परिवर्तन की समस्या का समाधान गैरबराबरी की कीमत पर करेंगे. कैटोविस इसी रुख के आसपास है. यह नए उत्सर्जन लक्ष्यों से संबंधित नियम तंत्र है. जलवायु परिवर्तन को लेकर होने वाले समझौते राष्ट्रीय असमानताओं को अभिव्यक्त करने का माध्यम बन गए हैं.
 
कैटोविस समानत की समस्या का समाधान तीन तरह से करने की कोशिश करता है. पहला यह कि विकासशील देशों के लिए उत्सर्जन लक्ष्य विकसित देशों के मुकाबले अधिक समय वाले हैं. इसलिए विकसित और विकासशील के बीच की सीमा कहां हो, इसे लेकर विवाद बना हुआ है. कैटोविस में तुर्की ने यह कहा कि उसे विकासशील देश माना जाना चाहिए. दूसरी बात उत्सर्जन लक्ष्यों से जुड़ी हुई है. इससे विकासशील देशों को उत्सर्जन बढ़ाने का अवसर मिलता है. तीसरी बात यह कि कैटोविस में विकासशील देशों में ‘वित्तीय फायनांसिंग’ के लिए हर साल 100 अरब डाॅलर देने की बात की गई है.
 
दुर्भाग्य से ये सारे कदम विकासशील देशों को लुभाने की कोशिश हैं. पिछले साल अटलांटिक हरीकेन से 100 अरब डाॅलर से अधिक का नुकसान हुआ था. कार्बन ट्रेडिंग का तंत्र स्थापित नहीं हुआ है. इससे अमीर देशों को लाभ होगा न कि गरीब देशों का. ऐतिहासिक गैरबराबरी बनी रहेगी. वैश्विक स्तर पर उर्जा दक्षता में सुधार से दूसरी ही कहानी समझ में आती है. कई राष्ट्रों ने ‘पाॅल्यूटर्स पे’ यानी प्रदूषण करने वाले के भुगतान के आधार पर उत्सर्जन में कटौती पर दिलचस्पी दिखाई है. राष्ट्रीय कर राजस्व सीमाओं के पार नहीं जाता लेकिन प्रदूषण जाता है. इससे तटीय इलाके खास तौर पर प्रभावित होते हैं. क्योंकि समुद्र स्तर बढ़ने और चक्रवातों से वे ही सबसे अधिक प्रभावित होते हैं. इन इलाकों में रहने वाले लोक जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं. इसके बावजूद कैटोविस ने इस ओर जरूरी ध्यान नहीं दिया. संभवतः हमें राष्ट्रीय उत्सर्जन करों में 20 फीसदी अंतरराष्ट्रीय सरचार्ज लगाने की जरूरत है ताकि समुद्र तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों का जलवायु परिवर्तन की वजह से जो नुकसान हो रहा है, उसकी भरपाई की जा सके.
 
लेखक डोमिनिका के प्रधानमंत्री के विशेष सलाहकार और लंदन व मुंबई की इलारा कैपिटल के चेयरमैन हैं.
 

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