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क्या हमें तटस्थ ब्यूरोक्रेसी की जरूरत है?

तटस्थता से सरकारी अधिकारियों को दलगत सरकार के उलझनों से बचने का अवसर मिलता है.
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

80 से अधिक सेवानिवृत्त ब्यूरोक्रेट्स का उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को खुला पत्र लिखा जाना कई मायने में महत्वपूर्ण है. पहली बात ये कि यह पत्र भारतीय संविधान के मूल्यों को ध्यान में रखते हुए लिखा गया है. इससे यह भी पता चलता है कि सरकारी अधिकारी नेताओं या अन्य किसी शक्ति के दास नहीं हैं बल्कि वे संविधान की नैतिक ताकत के तहत काम करते हैं. दूसरी बात यह कि तटस्थता का सिद्धांत इन अधिकारियों को सरकार की पार्टी से जुड़े हितों को साधने और किसी खास एजेंडे के साथ एक सामाजिक समूह को दूसरे समूह को दबाने की प्रक्रिया में मार्गदर्शन करता है. इस पत्र की भावना यह है कि सरकारी अधिकारियों को अपनी चिंताएं सरकार के सामने रखनी चाहिए. इन्होंने ये चिंताएं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के समक्ष रखी हैं. इन चिंताओं को दूर करने से न सिर्फ सरकार की विश्वसनीयता बहाल होगी बल्कि सरकारी अधिकारियों को भी उस वर्ग के लिए कुछ करने की प्रेरणा मिलेगी जो लगातार भीड़ की हिंसा का शिकार होने की आशंका से ग्रस्त है.
 
अभी जो स्थिति है उसमें संविधान के प्रति प्रतिबद्ध ब्यूरोक्रेसी बेहद प्रासंगिक है. पत्र से तीसरी बात यह आती है कि सरकार नाकाम रही है भीड़ की हिंसा रोकने में और इससे समाज के बारे में भी कई तरह के सवाल उठते हैं. भारत में हमें क्या संविधान के प्रति प्रतिबद्ध ब्यूरोक्रेसी की जरूरत है? विचारधारा और राजनीति के संदर्भ में ब्यूरोक्रेसी तटस्थ है. इस पत्र से एक बात यह भी निकलती है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी ये अफसर समाज में एक रचनात्मक हस्तक्षेप कर सकते हैं और वह भी किसी खास विचारधारा की राजनीति में शामिल हुए बिना. यह पत्र उन सेवानिवृत्त अफसरों को भी आईना दिखाने का काम कर रहा है जो उन राजनीतिक दलों में शामिल हो गए हैं जिन्होंने अब तक वैमनस्य और हिंसा के प्रति कठोर रुख नहीं अपनाया.
 
इसका उल्लेख करने की जरूरत नहीं है कि एक सही सरकारी अधिकारी के लिए संवैधानिक मूल्यों के प्रति न सिर्फ जीवन भर की प्रतिबद्धता रहती है बल्कि वह यह काम बगैर किसी राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित हुए करते रहता है. उन्हें किसी खास राजनीतिक विचारधारा से खुद को जोड़ने की जरूरत नहीं होती. संविधान ब्यूरोक्रेसी को शांति, समरसता और न्याय के प्रति प्रतिबद्ध रहने का आधार देता है. जो अफसर किसी राजनीतिक दल में चले गए हैं या जाने की योजना बना रहे हैं, उन्हें यह साबित करना होगा कि जब वे ब्यूरोक्रेसी में थे तो उस वक्त वे संवैधानिक मूल्यों के प्रति कितने प्रतिबद्ध थे. यह इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि सेवा के दौरान कुछ अधिकारी अपने पितृसत्तात्मक और जातिवादी सोच को बाहर नहीं रख पाते. प्रशासिकन ढांचे में एक व्यक्ति की जाति की जानकारी उसने स्थानांतरण के कागजों से अधिक गति से एक जगह से दूसरे जगह पर पहुंच जाती है. जाति, लिंग, क्षेत्र, धर्म और भाषा के आधार पर होने वाले भेदभाव के बारे में हम अक्सर सुनते रहते हैं.
 
सरकारी अधिकारियों की दो आपस में जुड़ी जिम्मेदारियां हैं. पहली बात तो यह कि सिविल सोसाइटी के कुछ तत्वों द्वारा सरकार के कार्यों में बाधा पहुंचाने या इसे कमतर दिखाने की कोशिश को रोकना. दूसरी जिम्मेदारी यह है कि जाति या पितृसत्तात्मक सोच के तहत से ही बाधा पहुंचाने की अगर कोई कोशिश की जाए तो उसे रोका जाए. ब्यूरोक्रेसी को ऐसी स्थिति में हस्तक्षेप करना चाहिए. इन दोनों जिम्मेदारियों को निभाने के लिए यह जरूरी है कि सरकारी अधिकारी सरकार की ओर से संविधान विरोधी बातों के लिए की जा रही कोशिशों का प्रतिरोध करें. वहीं दूसरी तरफ उन्हें अपने सक्रिय हस्तक्षेप से संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर समाज की समस्याओं को समझने और इसके समाधान की कोशिश करनी चाहिए. इस संदर्भ में ये सरकारी अधिकारी एक सार्वभौमिक वर्ग बन जाते हैं क्योंकि इनका लक्ष्य समान है शांतिपूर्ण समाज की स्थापना. शांतिपूर्ण मध्यस्थता और संवाद के जरिए इन पर सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का दायित्व होता है. इस वर्ग की सार्वभौमिकता किसी खास हित से संबंधित है. इसलिए इस पत्र में जिस तटस्थता के सिद्धांत का उल्लेख किया गया है, उससे सरकारी अधिकारियों को तत्कालीन सरकार का दास बनने से खुद को रोकना होगा.

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