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राफेल पर आए निर्णय का ट्रायल

सुप्रीम कोर्ट न्यायिक सक्रियता वहीं तक दिखा सकती है जहां तक सरकार की सहमति होती है
 

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सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि राफेल मामले की जांच के लिए कोई टीम गठित नहीं की जाएगी. इस निर्णय में अपूर्णता और जल्दबाजी दिखती है. विश्लेषकों ने तथ्यों की कई गड़बड़ियों की ओर इशारा किया है. इनमें एक यह है कि कोर्ट को यह लगा कि सीएजी ने रिपोर्ट दे दी है और वह रिपोर्ट संसद की लोक लेखा समिति यानी पीएसी के पास चली गई है. इस गलती की काफी चर्चा सार्वजनिक तौर पर हुई लेकिन इस फैसले के आधार में ही कई समस्याएं हैं.
 
जिस तरह से अदालत इस मामले की सुनवाई में आगे बढ़ी, उसमें भी कई समस्याएं हैं. अदालत ने यह कहा कि पहले की याचिका में दम नहीं है लेकिन अदालत ने इसका इंतजार नहीं किया कि याचिका की कमियों को दूर किया जाए और तब इस मामले में पूरी जानकारी के साथ हस्तक्षेप किया जाए. पूरी सुनवाई के दौरान अदालत इस बात में दिलचस्पी लेती नहीं नजर आई कि इस मामले की गहराई से जांच होनी चाहिए.
 
पहले तो अदालत ने कहा कि वह इस सौदे की कीमतों संबंधित पक्षों में नहीं जाना चाहती. बाद में सरकार से कहा कि वह सीलबंद लिफाफे में ये जानकारियां मुहैया कराए. दूसरी बात यह कि इन लिफाफों में ही सरकार ने अपना पक्ष अदालत के सामने रख दिया और याचिका दायर करने वाले कों सरकार के तर्कों को काटने का अवसर नहीं मिला. सीएजी रिपोर्ट और पीएसी को लेकर हुई गफलत की वजह यही लगती है. अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि केंद्र सरकार ने जानबूझकर अदालत को गुमराह किया या अदालत से खुद समझने में गलती हुई. अदालत द्वारा सरकार के पक्ष पर अपना तर्क देने का अवसर याचिकाकर्ताओं को नहीं दिए जाने से भी अदालत की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं.
 
तीसरी बात यह कि अदालत ने बार-बार कहा कि रक्षा खरीद उसकी तकनीकी क्षमता से से परे हैं लेकिन डसाॅल्ट राफेल लड़ाकू विमानों की जरूरत के बारे में अदालत ने टिप्पणी की. ऐसा लगता है कि ये टिप्पणी सुनवाई के दौरान वायु सेना के अधिकारियों से हुई बातचीत के आधार पर जल्दबाजी में की गईं. क्योंकि इन अधिकारियों की बातचीत को कहीं रिकाॅर्ड नहीं किया गया न ही उनसे ट्रायल कोर्ट में अपनी बात कहने को कहा गया.
 
इसका नतीजा यह हुआ कि यह विवाद खत्म होने के बजाए इस विवाद से संबंधित ज्यादातर सवालों का जवाब नहीं मिल पाया. साथ ही इस तरह के मामलों से निपटने की अदालत की क्षमता पर इस तरह के फैसले से सवालिया निशान लगा.
उच्चतम न्यायालय विवादास्पद मुद्दों पर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार से बचती ही रही है. चाहे वह विमुद्रीकरण का मामला हो या फिर जज बृजगोपाल हरकिशन लोया की मौत का मामला हो. जबकि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कार्यकाल के आखिरी दिनों में सामने आए घोटालों में उच्चतम न्यायालय काफी सक्रिय दिखती थी. इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि न्यायिक सक्रियता वहीं तक दिखती है जहां तक उस वक्त की सरकार की सहमति होती है. 
 
लेकिन इस तरह के निष्कर्ष से गहरी सच्चाइयां सामने नहीं आतीं. सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट पर अदालती फैसले होते थे लेकिन अब इसकी चर्चा तक नहीं सुनाई देती. जिस सीबीआई पर अदालत जांच के लिए निर्भर है, वह खुद बहुत अधिक खींचतान की स्थिति में दिख रही है. जिस केंद्रीय सतर्कता आयोग पर सीबीआई के निगरानी का दायित्व है, वह समय से हरकत में नहीं आती. जब दूसरी एजेंसियां कानूनी दायित्वों के तहत काम नहीं कर रही हों तो राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट का कोई भी हस्तक्षेप अंधेरे में तीर मारने की तरह ही होता.
 
हालिया निर्णय का सबसे विचित्र हिस्सा यह है कि इसमें सौदे में किसी तरह की गड़बड़ी को सिरे से खारिज कर दिया गया है. अदालत ने सरकार द्वारा की गई जानकारियों के आधार पर फैसला करने में जल्दबाजी दिखाई. यह सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह इस मामले पर सारी जानकारी अदालत को देती. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ऐसी स्थिति में अदालत को सभी जरूरी जानकारियां मांगनी चाहिए थी. इससे हमें यह पता चलता कि इस मामले में अधिक पूर्ण निर्णय आने वाला है.
इन एजेंसियों के सहयोग से यह बात सुनिश्चित नहीं हो जाती कि अदालती हस्क्षेप से न्याय का या संवैधानिक लक्ष्य पूरे ही होते हैं. 2जी मामले में इतना हो-हल्ला हुआ लेकिन अंत में सारे आरोपी बरी हो गए. 
 
किसी न किसी मोड़ पर सुप्रीम कोर्ट को राफेल मामले में प्रक्रियात्मक तौर पर अधिक संतुलित भूमिका निभानी पड़ेगी. क्या यह कानूनी विवादों का संतुलित मध्यस्थ है? क्या यह सच को सामने लाने वाली संस्था है? क्या ये अपनी सुविधा के अनुसार एक बार कुछ और दूसरी बार कुछ और होने का चयन कर सकती है? जिस तरह के सवाल उठ रहे हैं उसमें इस तरह के आत्ममंथन को अब और नहीं टाला जा सकता.

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