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भाजपा के आत्मविश्वास को झटका

चुनावी नतीजों ने राजनीतिक चिंताओं के मूल में एक बार फिर से जनता को ला खड़ा किया है
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार के छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में लोगों ने खारिज कर दिया. इन नतीजों से यह भी स्पष्ट है कि लोग केंद्र सरकार की जन विरोधी नीतियों को भी खारिज कर रहे हैं. हालांकि, भाजपा के लोग इन नतीजों को स्थानीय मुद्दों से जोड़कर प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन सच तो यह है कि कृषि संकट, बेरोजगारी, जीवनयापक के स्रोत खत्म होना और इसकी जड़े नोटबंदी और जीएसटी तक जुड़ी हुई हैं और इन वजहों से लोगों को काफी परेशानी हो रही है. 
 
इन वजहों से लोगों में बढ़ते गुस्से को देखते हुए भाजपा और संघ परिवार नफरत के एजेंडे पर लौट रहे हैं ताकि धु्रवीकरण हो सके. योगी आदित्यनाथ से सघन चुनाव प्रचार कराना इसका मजबूत संकेत है. लेकिन जिन क्षेत्रों में आदित्यनाथ की सभाएं हुईं, वहां भाजपा का प्रदर्शन बहुत बुरा रहा. राजस्थान के अलवर क्षेत्र में पिछले चार साल में गौ-रक्षा के नाम पर काफी तांडव मचाया गया. इस क्षेत्र में भाजपा बुरी तरह हारी. तेलंगाना में भी योगी आदित्यनाथ की कई सभाएं हुईं. यहां भी भाजपा की सीटों में काफी कमी आई. यहां तक नरेंद्र मोदी ने जो जुमले उछाले, उनका भी मतदाताओं पर कोई असर नहीं पड़ा.
 
मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए संघ परिवार और भाजपा ने राजस्थान और मध्य प्रदेश की हार को कड़ी टक्कर के तौर पर पेश करना शुरू किया है. मध्य प्रदेश के बारे में कहा जा सकता है कि वहां इसी तरह की टक्कर होती है. राजस्थान में पहले के चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच जितना अंतर रहा है, उसके आधार पर तो कहा जा सकता है कि भाजपा की हार और बड़ी है. भाजपा के इन तर्कों के बीच यह एक तथ्य है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने भाजपा के 15 साल के राज को खत्म किया और राजस्थान में लंबी खाई को पाटा. इन राज्यों की 65 लोकसभा सीटों में से भाजपा को 2014 में 62 सीटें मिली थीं. ऐसे में विधानसभा के नतीजे इस क्षेत्र में भाजपा के लिए खतरे की घंटी हैं. शहरी क्षेत्रों में भाजपा कमजोर पड़ी है. इससे यह पता चलता है कि लोगों में बेरोजगारी और जीएसटी की वजह से छोटे कारोबार पर पड़े नकारात्मक असर की वजह से नाराजगी है. यह माना जाता है कि शहरी भारत में मोदी और भाजपा मजबूत हैं लेकिन इन नतीजों से यह अवधारणा भी कमजोर पड़ी है.
 
हालांकि, जिस तरह का गुस्सा लोगों में है, उसमें कांग्रेस को और बड़ी जीत हासिल करनी चाहिए थी. सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही कांग्रेस को बड़ी कामयाबी दो-तिहाई बहुमत के रूप में मिली. यह कहना पूरा सच नहीं है कि शिवराज सिंह चैहान मध्य प्रदेश में बेहद लोकप्रिय थे और राजस्थान में नरेंद्र मोदी ने आखिरी चरण में प्रचार किया, इससे कांग्रेस को बड़ी जीत नहीं मिली. कांग्रेस की कम बड़ी कामयाबी को उसकी सांगठनिक कमजोरी से जोड़कर देखा जा रहा है. कांग्रेस छत्तीसगढ़ के अपने अभियान से सबक ले सकती है. छत्तीसगढ़ के चुनाव अभियान में कांग्रेस ने लोगों की मुश्किलों को लगातार उठाया. राजस्थान और मध्य प्रदेश में वामपंथी दलों ने किसानों के मुद्दों से जुड़े अभियानों को जिस तरह चलाया उसका फायदा सीधे द्विपक्षीय मुकाबले में कांग्रेस को मिला. 
 
कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि वह लोगों की स्वाभाविक पसंद अभी नहीं बनी है. क्योंकि मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा के मत प्रतिशत को देखते हुए फिर से उसके खड़ा होने की संभावना बनी हुई है. कांग्रेस को वैकल्पिक नीतियां पेश करनी होंगी ताकि लोगों का जीवन स्तर सुधरे और सामाजिक स्थिरता आए. ग्रामीण संकट के समाधान के साथ-साथ गौ-रक्षा के नाम पर फैलाई जा रही गुंडागर्दी को भी रोकना चाहिए. यह भी तय है कि भाजपा और संघ चुनावों के दिनों में नफरत के एजेंडे को और बढ़ाएंगे. लोकसभा चुनावों में कम वक्त को देखते हुए इन तीनों राज्यों में कांग्रेस सरकार को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिससे लोगों में उम्मीद जगे. विपक्ष के पक्ष में बनी जनभावना तब बरकरार रह सकती है जब विपक्ष इन चुनावों के मूल संदेश को समझे और वो यह कि जनता राजनीति के केंद्र में रहे. राजनीतिक विमर्श नीतियों के आसपास हो, नेताओं के आसपास नहीं. विमर्श में इस तरह का बदलाव अगले लोकसभा चुनावों को देखते हुए बेहद जरूरी है.

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