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सांस लेने की कीमत

वायु प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा बन गया है और इसका दीर्घकालिक समाधान जरूरी है

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लैंसेट में प्रकाशित शोध से यह स्पष्ट है कि भारत में वायु प्रदूषण की वजह से बड़ी संख्या में लोग मर रहे हैं और कई तरह की बीमारियों का सामना कर रहे हैं. वायु प्रदूषण की वजह से पैदा हुई स्वास्थ्य आपदा से निपटने के लिए नए सिरे से इससे बचाव के उपाय करने की जरूरत है. लेकिन भारत में वायु प्रदूषण की वजह से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों को कभी स्वीकार ही नहीं किया गया.
 
यह अध्ययन दो संस्थाओं ने मिलकर किया है. इसमें बाहरी और घर के अंदर के प्रदूषण दोनों का स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया गया है. अध्ययन में यह बात सामने आई है कि 2017 में भारत की आबादी को पीएम 2.5 के 89.9 के स्तर का सामना करना पड़ा है, जो विश्व में सबसे अधिक है. भारत का कोई भी राज्य ऐसा नहीं है जहां विश्व स्वास्थ्य संगठन के दस तक के स्तर का पालन किया जा रहा हो. भारत में जिस 40 के स्तर की बात यहां की एजेंसी करती है, उससे अधिक स्तर का सामना देश की 77 फीसदी आबादी कर रही है. 
 
कुल बीमारियों में तंबाकू से अधिक योगदान वायु प्रदूषण का है. अध्ययन में यह बात आई है कि 2017 में 12.4 लाख लोगों की जान वायु प्रदूषण की वजह से गई. इनमें से 51.4 फीसदी लोगों की उम्र 70 साल से कम है. अगर वायु प्रदूषण नियंत्रण में होती तो जीवन प्रत्याशा औसतन 1.7 साल अधिक होती. हालांकि, प्रदूषण के स्तर के मामले में राज्यों के बीच अंतर है. वायु प्रदूषण का जीवन प्रत्याशा पर प्रति व्यक्ति असर के मामले में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और पंजाब सबसे आगे हैं तो प्रति परिवार असर के मामले में छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश और असम आगे हैं. वायु प्रदूषण से सिर्फ शहरी क्षेत्र प्रभावित नहीं हो रहे हैं बल्कि ग्रामीण आबादी पर भी बहुत बुरा असर पड़ रहा है.
उद्योगों, गाड़ियों, पराली जलाने और निर्माण गतिविधियों से होने वाला प्रदूषण अर्थव्यवस्था के बढ़ने के बाद से लगातार बढ़ा है. नई दिल्ली की स्थिति किसी से छिपी नहीं है. इस वजह से सरकार को कई कदम उठाने को बाध्य होना पड़ा है. अब वक्त आ गया है कि यह स्वीकार किया जाए कि वायु प्रदूषण की आर्थिक कीमत भी बहुत अधिक है. 2016 में विश्व बैंक और वाशिंगटन विश्वविद्यालय के अध्ययन में यह बात आई थी कि वायु प्रदूषण की वजह से 2013 में भारत को 50.5 अरब डाॅलर का सामाजिक कल्याण नुकसान हुआ था. इसकी वजह से श्रम बल में भी 55.39 अरब डाॅलर का नुकसान 2013 में हुआ था. इन दोनों को जोड़ें तो जीडीपी का कुल नुकसान 8.5 फीसदी बैठता है. इससे साफ है कि वायु प्रदूषण से आर्थिक विकास पर काफी नकारात्मक असर पड़ता है.
 
केंद्र सरकार ने बहुत हाल में इस समस्या को समझना शुरू किया है. सरकार ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत वायु प्रदूषण को पूरे देश की समस्या माना है. इस कार्यक्रम के जरिए वायु प्रदूषण के जरिए संस्थागत उपाय करने की कोशिश हो रही है. हालांकि, पर्यावरणविदों ने यह कहते हुए इसका विरोध किया है कि इसमें समयबद्ध तरीके से वायु प्रदूषण में कमी लाने के उपायों को लेकर स्पष्टता नहीं है. ये सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि सरकार ने हाल में कोयला आधारित बिजली इकाइयों को प्रदूषण नियमों के पालन में थोड़ी ढील दी है. पहले इन्हें 2017 तक उत्सर्जन मानकों को पूरा करना था. अब इन्हें कानूनी पालन की बंदिश से मुक्त करने के अलावा बड़े निर्माण परियोजनाओं को पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन से भी बाहर करने का निर्णय लिया गया है. इससे वायु प्रदूषण कम करने के प्रति सरकार की नीयत पर संदेह पैदा होता है. क्योंकि इससे निपटने के लिए न सिर्फ क्षेत्रीय स्तर पर समन्वय की जरूरत है बल्कि जमीनी स्तर पर जरूरी कदम उठाने की भी आवश्यकता है.

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