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महाराष्ट्र में सूखा

सूखे की स्थिति से निपटने में सरकार की अक्षमता की वजह से गांवों का संकट और गहराता जा रहा है

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सूखा प्रभावित इलाकों से भारी जनदबाव और सूखे की परिभाषा को लेकर चली चर्चा के बाद महाराष्ट्र सरकार ने अंततः 31 अक्टूबर को 26 जिलों के 151 तालुकाओं को सूखा ग्रस्त घोषित कर दिया. खबरों के मुताबिक सरकार ने यह घोषणा करने के लिए स्थिति को कम करके आंका है. ऐसा इसलिए क्योंकि राज्य सरकार का पूरा ध्यान केंद्र सरकार के सूखा संबंधित 2016 के कठोर नियमों के पालन पर था.
 
महाराष्ट्र एक अभूतपूर्व सूखे का सामना कर रहा है. इस बार का सूखा 1972 के सूखे से भी अधिक भयावह माना जा रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि इस बार रबी और खरीफ दोनों फसलों पर सूखे की मार पड़ रही है. 15 नवंबर तक सिर्फ 13.05 लाख हेक्टेयर जमीन पर रबी फसल लग पाई है. जबकि 2017 में इस वक्त तक 28.35 लाख हेक्टेयर पर रबी फसल लग गई थी. जमीन में नमी नहीं है और जलाशयों में पानी नहीं है. पीने के लिए पानी का भंडारण करने से इस साल रबी फसल पर और बुरा असर पड़ा है. सामान्य से 30 फीसदी कम हुई बारिश ने भी स्थिति को और बिगाड़ा है.
 
सूखे की स्थिति सबसे अधिक भयावह उत्तर महाराष्ट्र के नासिक क्षेत्र में और मराठवाड़ा में है. इन दोनों क्षेत्रों के बांधों में क्रमशः 65 फीसदी और 27 फीसदी जल भंडारण है. नवंबर की शुरुआत में 575 टैंकरों के जरिए 498 गांवों और 959 अन्य बसावटों की पानी की जरूरतें पूरी की जा रही थीं. नवंबर के अंत तक टैंकरों की संख्या बढ़कर 816 हो गई और ऐसे गांवों की संख्या 698 और अन्य बसावटों की संख्या 1,511. पिछले साल यह आंकड़ा 93 टैंकरों और 122 गांवों का था. इस स्थिति के लिए सिर्फ कम बारिश को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. यह नीतियों की नाकामी की कहानी भी कहता है. 
 
हालांकि, राज्य सरकार के बड़े-बड़े दावों और वास्तविक स्थिति की वजह से इन आंकड़ों को सामने रखना जरूरी हो जाता है. सूखे की वजह से एक बार फिर देवेंद्र फडणवीस सरकार की जलयुक्त शिवर योजना पर सवाल उठाने को बाध्य होना पड़ रहा है. महाराष्ट्र सरकार इसे अपनी एक बड़ी उपलब्धि बताती है. कुछ ही दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नासिक में यह दावा किया था कि इस योजना के जरिए 16,000 गांवों को सूखा मुक्त बनाया गया है. इसके बावजूद महाराष्ट्र सरकार को 151 तालुकाओं को जिनमें 20,000 गांव हैं, उन्हें सूखा ग्रस्त घोषित करना पड़ा. राज्य सरकार ने यह नहीं बताया कि सूखा मुक्त घोषित कितने गांव सूखा ग्रस्त की श्रेणी में आ गए हैं. सरकार यह दावा करती है कि इस योजना की वजह से भूजल स्तर सुधरा है. लेकिन ग्राउंडवाटर सर्वे ऐंड डेवलपमेंट एजेंसी के आंकड़ों से यह पता चलता है कि 11,487 गांवों का भूजल स्तर एक से दो मीटर और नीचे गया है और 5,556 गांवों में यह गिरावट एक से दो मीटर की है. 2,990 गांवों में जल स्तर दो मीटर से अधिक और 2,941 गांवों में जल स्तर तीन मीटर से अधिक नीचे गया है. इसके लिए कम बारिश को सिर्फ जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. क्योंकि जीएसडीए के आंकड़े बताते हैं कि 2014 और 2015 में कम बारिश के बावजूद एक मीटर से अधिक भूजल स्तर नीचे जाने वाले गांवों की संख्या काफी कम थी.
 
जलयुक्त शिवर योजना पर बहुत सवाल उठ रहे हैं. इस पर 8,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किया जा चुका है. इसका कुछ अच्छा परिणाम नहीं आया बल्कि गलत परिणाम ही आया है. कई विशेषज्ञों ने इसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को लेकर चिंता जताई है. जेसीबी-ठेकदार लाॅबी की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं जो नाला गहरा करने के पैरोकारी कर रहे हैं. इस सूखे की वजह से सरकार को आत्मप्रशंसा से बाहर आकर महत्वपूर्ण आवाजों को सुनना चाहिए.
महाराष्ट्र सरकार जलयुक्त शिवर जैसे योजनाओं का बखान करते नहीं थकती जबकि सच यह है कि इसे चारे का संकट पैदा होने की आशंका पैदा हो गई है. जानवरों के लिए चारा छावनी की मांग उठ रही है. पशुपालन विभाग किसानों को चारा पैदा करने के लिए प्रत्यक्ष हस्तांतरण का प्रस्ताव दिया है. यह एक भद्दा मजाक है क्योंकि सूखे की वजह से चारा उगाना असंभव जेसा हो गया है.
 
इस बार का सूखा 1972 के सूखे से अलग है. 1972 के सूखे के बाद सूखे से बचाव के लिए जन आंदोलन खड़ा हो गया था. इसकी अगुवाई दुष्काल निवारण अणि निर्मूलन मंडल ने किया था. इससे सूखे में इंसानों की भूमिका को लेकर जागरूकता आई. लेकिन इस बार के सूखे के बाद ऐसी कोई पहल होती नहीं दिख रही है. जबकि सूखे से बचाव के लिए ऐसी कोशिश की जरूरत है. तत्काल राहत के साथ दीर्घकालिक उपायों पर भी काम करना वक्त की जरूरत है. निहित स्वार्थों और लाॅबी करने वाले के दबाव को भी जन दबाव से कम किया जा सकता है.

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