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एक सम्मानजनक दूरी बनाए रखने की जरूरत

रेखा चौधरी इंडियन इस्टीट्यूट आॅफ एडवांसड स्टडीज, राष्ट्रपति निवास, शिमला में फेलो हैं.

जम्मू कश्मीर की आंतरिक राजनीति में कोई भी दखल मुख्याधारा की राजनीतिक जमीन को खिसकाने वाली और अलगाववादी राजनीति को बढ़ावा देने वाली साबित होगी

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रेखा चौधरी
 
जम्मू कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार के गिरने के पांच महीने बाद राज्यपाल द्वारा विधानसभा भंग किया जाना कश्मीर के राजनीति इतिहास की एक अहम राजनीतिक घटना है. यह सिर्फ राजनीतिक दलों के लिए अल्पकालिक तौर पर असर डालने वाली नहीं है बल्कि केंद्र सरकार के प्रति लोगों की आम धारणा की वजह से लोकतांत्रिक संभावनाओं के संकुचन के लिए भी ठीक नहीं है.
विधानसभा भंग करने का हालिया निर्णय इसलिए भी विवादास्पद हो गया क्योंकि यह निर्णय पीडीपी की महबूबा मुफ्ती की ओर से सरकार बनाने का दावा करने के तुरंत बाद लिया गया. मुफ्ती ने यह दावा जम्मू कश्मीर नैशनल कांफ्रेस और कांग्रेस के समर्थन से किया था. दूसरी तरह जम्मू कश्मीर पीपुल्स कांफ्रेंस ने सज्जाद लोन ने भी भाजपा के समर्थन से सरकार बनाने का दावा ठोंका था.
 
नैशनल कांफ्रेंस और पीडीपी विधानसभा भंग करने की मांग पहले से भी बड़े जोर-शोर से उठा रहे थे. यह मांग उन अटकलों के बीच भी की जा रही थी जिसमें यह कहा जा रहा था कि भाजपा जेकेपीसी के साथ मिलकर सरकार बना सकती है. इसके तहत पीडीपी, नैशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस के कुछ विधायकों के टूटने की बात भी आ रही थी. जब लोन ने तीसरे मोर्चे की बात छेड़ी तो पीडीपी के कई विधायकों ने सार्वजनिक तौर पर इसमें शामिल होने की इच्छा जताई.
 
ऐसे में नैशनल कांफ्रेंस, पीडीपी और कांग्रेस के बीच महागठबंधन की बात भाजपा समर्थित तीसरे मोर्चे की सरकार बनने से रोकने के लिए चली थी. यही वजह थी कि पीडीपी और जेकेएनसी ने विधानसभा भंग करने की राज्यपाल के निर्णय की आलोचना की. हालांकि, यह उनकी पहले की इच्छा के अनुकूल ही था. इससे इन पार्टियों के लिए अस्थिरता का संकट भी खत्म हो गया जिसका बहुत ज्यादा खतरा था. यह खतरा दो दशक पुरानी पीडीपी के लिए ज्यादा था क्योंकि पार्टी टूट के कगार पर थी. नैशनल कांफ्रेंस के लिए भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. घाटी में भी नैशनल कांफ्रेंस सबसे बड़ी पार्टी नहीं बची थी और जेकेपीसी के उभार की वजह से इसके लिए और खतरा बढ़ता.
 
अगर फौरी तौर पर देखें तो यह कहा जा सकता है कि विधानसभा भंग होने से पीडीपी पर मंडरा रहा खतरा टल गया है और नैशनल कांफ्रेंस ने भाजपा को रोकने के लिए कश्मीर के हित को सबसे आगे रखकर अपनी स्थिति थोड़ी मजबूत की है. हालांकि, इस पूरे मामले ने कश्मीर की लोकतांत्रिक राजनीति को कमजोर करने का ही काम किया है. यह एक तथ्य है कि अलगाववादी राजनीति अब भी है लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में लोगों का भरोसा बढ़ा है. यह कोई छोटी चीज इसलिए नहीं है क्योंकि 1989 में आतंकवाद और अलगाववाद की वजह से मुख्यधारा की राजनीति पूरी तरह से ध्वस्त हो गई थी. यह कांग्रेस ही थी जिसने जरूरत से ज्यादा दखल देकर जम्मू कश्मीर की राजनीति को इस हाल में पहुंचा दिया था. कांग्रेस ने राज्य की राजनीति पर कब्जा जमाए रखने के मकसद से 1984 में नैशनल कांफ्रेंस में फूट डालने का काम किया. इसके बाद कांग्रेस की केंद्र सरकार ने फारुख अब्दुल्ला सरकार को सत्ता से बेदखल करके अलोकप्रिय जीएम शाह की अगुवाई में सरकार बनवाई. 1986 में नैशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन के साथ-साथ 1987 में हुई घटनाओं ने कश्मीर के लोगों का लोकतांत्रिक राजनीति से भरोसा हिला दिया. इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी को इस बात के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी कि कश्मीर के लोगों का लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर फिर से विश्वास कायम हो सके. 2002 में उन्होंने न सिर्फ निष्पक्ष चुनाव का वादा किया बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि राज्य की राजनीति से केंद्र सरकार एक सम्मानजनक दूरी पर रहे. इससे प्रदेश में लोकतांत्रिक विस्तार हुआ और इसका व्यापक सकारात्मक असर पड़ा. 
 
इस दृष्टि से अगर देखें तो हाल में जो कुछ भी हुआ वह कश्मीर में लोकतंत्र के भविष्य के लिए ठीक नहीं है. स्थानीय दलों को तोड़कर भाजपा की सरकार बनाने की कोशिश की तुलना राजनीतिक विश्लेषक 1984-87 के दौर में कांग्रेस द्वारा अपनाए गए इसी तरह के रवैये से कर रहे हैं. यह एक अच्छा समाचार नहीं है. खास तौर पर तब जब कश्मीर में आतंकवाद और अलगाववाद एक बार फिर से सर उठाता दिख रहा है. जब राजनीतिक स्थिति इतनी गंभीर बनी हुई हो तो ऐसे में स्थानीय राजनीति में किसी भी तरह के दखल से न सिर्फ मुख्यधारा की राजनीति कमजोर होगी बल्कि इससे अलगाववाद की राजनीति को बल मिलेगा. अभी की जो स्थिति है, उसमें लोकतांत्रिक राजनीति को मजबूत करने की जरूरत है न कि किसी खास राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने के लिए राजनीति को अपने हिसाब से तोड़ने-मरोड़ने की.
 
 

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