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एकता के मानकों की अनदेखी

भाजपा की ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ परियोजना सरकार की अगुवाई वाली काॅरपोरेटवाद का प्रतीक है

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वकांक्षी ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ ने राजनीति के वैश्विक पटल पर भारत का शर्मशार किया है. वाशिंगटन पोस्ट ने लिखा कि 600 फुट की यह आकृति भारत की वैश्विक आकांक्षाओं के साथ इसके नेता के राजनीतिक अहंकार को भी दिखाता है. ब्रिटेन के सांसद पीटर बोन ने कहा कि भारत को विकास अनुदान देने की कोई जरूरत नहीं है. भारत ने इस परियोजना पर 43 करोड़ पाउंड खर्च किए जबकि इस दौरान भारत को ब्रिटेन से 1.1 अरब डाॅलर पाउंड विकास अनुदान के तौर पर मिला. इस परियोजना से स्थानी आदिवासी भी नाखुश हैं. लेकिन मोदी के लिए यह परियोजना उन लोगों को जवाब है जो भारत के अस्तित्व और इसकी इंजीनियरिंग से संबंधित क्षमताओं पर सवाल उठाते हैं.
 
लेकिन असली लागत कौन जानता है? विभिन्न दस्तावेजों से यह पता चलता है कि जो लागत बताई जा रही है, वह वास्तविक लागत से कम है. जिस 2,980 करोड़ रुपये की लागत की बात की जा रही है, वह राज्य सरकार ने 2014-15 से अब तक अपने बजट से खर्च किया है. केंद्रीय बजट से अलग से 309 करोड़ रुपये दिए गए हैं. सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड के प्रबंध निदेशक संदीप कुमार ने एक साक्षात्कार में 550 करोड़ रुपये का जिक्र किया जो सार्वजनिक कंपनियों, निजी कंपनियों और अलग-अलग लोगों से दान में मिला. इन तीनों खर्च को जोड़ने पर कुल खर्च 3,893 करोड़ रुपये होता. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से सीएसआर के तहत 146.83 करोड़ रुपये की पहेली भी है. सीएजी ने इस पर आपत्ति की है.
 
भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी वल्लभभाई पटेल की विरासत कब्जाना चाहते हैं. इसके लिए इस विशाल मूर्ति को विरासत करार देने की कोशिश कर रहे हैं. सीएसआर का पैसा इसमें इस्तेमाल करने से भी कई सवाल जुड़े हुए हैं. सीएसआर के तहत होने वाला खर्च बहुत अच्छे से भारत में नहीं बढ़ा लेकिन अब भी इसका 60 फीसदी स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता आदि पर खर्च होता है. इस रकम को दूसरे काम में खर्च करने के से सामाजिक क्षेत्र के विकास पर नकारात्मक असर पड़ेगा. खास तौर पर तब जब इस क्षेत्र में सरकार की भूमिका सीमित होती जा रही है. इस मद में पिछले चार साल में गुजरात सरकार का खर्च 70 फीसदी से घटकर 60 फीसदी हो गया है. वहीं गैर विकास कार्यों पर होने वाला खर्च 30 प्रतिशत से बढ़कर 40 फीसदी हो गया है. ऐसे में भाजपा, मोदी और सरकारी कंपनियां इस परियोजना से जुड़े रोजगार के दावों को कैसे सही ठहराएंगे? बेरोजगारी की समस्या का सामना करने में राजनीतिक नेतृत्व नाकाम रहा है. ऐसे में रोजगार के ये दावे खोखले ही दिखते हैं. यहां आदिवासी शोध और प्रशिक्षण संस्थान स्थापित करने के लिए तेजी से आवंटन किया गया. लेकिन इस परियोजना की वजह से आदिवासियों के विस्थापन की समस्या को नहीं सुलझाया गया. सरदार सरोवर बांध से जो आदिवासी विस्थापित हुए थे, अब भी उनका पुनर्वास नहीं हो सका है. इन्हें कोई सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नहीं मिल पाता और इससे आदिवासियों की स्थिति में सुधार नहीं हो पा रहा है. अगर इन सामाजिक मूल्यों को शामिल कर लिया जाए तो इस परियोजना की लागत और बढ़ जाएगी.
 
एकता का मानक समाज के लिए बेहद जरूरी है. लेकिन भाजपा इसे जो मतलब देना चाह रही है, वह ठीक नहीं है. इस मूर्ति को ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ का नाम देना राजनीति से प्रेरित है. इसके जरिए भाजपा पटेल की एकता की विरासत पर दावा कर रही है. वित्तीय समावेशन, काले धन पर हमला आदि के नाम पर जिस तरह की नीतियां लागू की गईं उससे नियमों के पालन को बोझ बढ़ा और काॅरपोरेटवाद को बढ़ावा मिला.
 
पटेल की मूर्ति की परियोजना में भी पीतल का आवरण चीन से मंगाया गया. इसके लिए ‘मेक इन इंडिया’ कहीं आड़े नहीं आया. सरदार सरोवर के दायरे में आने वाले किसानों को स्वीकृत नहर नेटवर्क का 20 फीसदी गंवाना पड़ा. इन सबके बीच पटेल के विचारों को एक पार्टी के फायदे के लिए इस्तेमाल करने के कई बड़े नुकसान हैं.

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