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आयुष्मान भारत- निजी क्षेत्र को बढ़ावा

आयुष्मान भारत-राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा मिशन का चलते रहना सवालों के घेरे में है

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मानव विकास का एक मुख्य संकेतक स्वस्थ्य आबादी है. विश्व बैंक के मुताबिक 2015 में भारत में स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च जीडीपी का 3.8 फीसदी था. अमेरिका में यह 16.8 फीसदी और पूरे विश्व में 9.9 फीसदी था. भारत की 15 फीसदी आबादी के पास बीमा है. यहां स्वास्थ्य पर होने वाले कुल खर्च का 94 फीसदी लोग अपनी जेब से करते हैं. इसका मतलब यह हुआ कि स्वास्थ्य संबंधित समस्याएं लोगों और परिवारों को कर्ज के कुचक्र में फंसाने का काम कर रही हैं. गरीब लोगों को स्वास्थ्य बीमा दिलाने से उन्हें मदद मिलेगी और कई परिवार गरीबी के दुष्चक्र से निकल पाएंगे.
 
इस पृष्ठभूमि में मोदीकेयर के नाम से जाने जा रहे आयुष्मान भारत में दिलचस्पी जगती है. इसके तहत दस करोड़ परिवारों को पांच लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा दिया जाना है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना से यह योजना इस मामले में अलग है कि इसमें प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं भी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए दी जाएगी. बीमा की रकम को भी 30,000 से बढ़ाकर पांच लाख कर दिया गया है. पूरी योजना को डिजिटल बनाने पर भी जोर है. कुछ उसी तरह जिस तरह आंध्र प्रदेश में राजीव आरोग्यश्री स्वास्थ्य बीमा योजना में किया गया. सरकार पूरी आबादी के 40 फीसदी को इसके दायरे में लाना चाहती है. एक समस्या यह है कि कैसे इस योजना को सतत बनाया जाए. क्योंकि इससे वित्तीय बोझ बढ़ेगा. सरकार यह दावा कर रही है कि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण से जो 90,000 करोड़ रुपये बचे हैं, उसका इस्तेमाल इसमें होगा. लेकिन वित्तीय लेखा-जोखा में तो पहले ही इस रकम को शामिल कर लिया गया है. राज्यों को कुल खर्च का 40 फीसदी वहन करना है. इससे राज्यों पर भी वित्तीय बोझ बढ़ेगा. फिर वे केंद्र सरकार से अधिक पैसों की मांग करेंगे. खास तौर पर गरीब राज्यों में स्थिति ज्यादा खराब होगी. ऐसे में गरीब राज्यों के लिए इसे लागू करना मुश्किल होगा.
 
स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित बुनियादी ढांचा भी एक बड़ी समस्या है. 80 फीसदी डाॅक्टर और 75 फीसदी अस्पताल शहरी क्षेत्रों में हैं. जहां देश की सिर्फ 28 फीसदी आबादी रहती है. भारत में 1,000 की आबादी पर  अस्पतालों में सिर्फ 0.9 बेड उपलब्ध हैं. जबकि विकसित देशों में यह आंकड़ा 6.5 फीसदी है. भारत में 1,000 की आबादी पर 0.6 डाॅक्टर हैं जबकि विकसित देशों में यह आंकड़ा तीन के आसपास है. विश्व बैंक के मुताबिक 2015 में 15 फीसदी बच्चों को बुनियादी टीका नहीं लग पाया.
सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव से निजी क्षेत्र पर निर्भरता बढ़ती है. जहां सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं ठीक हैं वहां निजी स्वास्थ्य सेवाएं सस्ती हैं. तमिलनाडु इसका एक उदाहरण है. वहीं उत्तर भारत में निजी स्वास्थ्य सेवाएं काफी महंगी हैं. कोई ऐसी विश्वसनीय एजेंसी नहीं है जो इन अस्पतालों के कामकाज पर निगरानी रखे. इन अस्पतालों की गड़बड़ियों पर नजर नहीं रखा गया तो ये बीमा की सारी रकम को एक ही बार में खर्च करा देंगे. 
इसके साथ ही सरकारी अस्पतालों के डाॅक्टरों की निगरानी भी जरूरी है. सरकारी अस्पतालों के डाॅक्टर आम तौर पर निजी प्रैक्टिस भी करते हैं. निजी स्वास्थ्य सेवाएं भी इस योजना के तहत हैं. इसलिए संभव है कि सरकारी डाॅक्टर निजी क्षेत्र को अपनी सेवा देने के लिए ज्यादा तत्पर रहें.
 
लोगों को जब यह पता होगा कि निजी क्षेत्र में भी इलाज कराया जा सकता है तो वे अपनी मामूली समस्याओं के लिए निजी अस्पतालों में जा सकते हैं. इससे लोगों में बचत के प्रति रुझान कम होगा और सिगरेट-तंबाकू जैसे व्यसन बढ़ सकते हैं. हमें ऐसी निगरानी एजेंसियां चाहिए जो इन पक्षों पर ध्यान दे सकें. यह स्पष्ट नहीं है कि इस योजना को लागू करने वाली एजेंसियों इन समस्याओं के बारे में सोचा है या नहीं.
अगर इसका ठीका से क्रियान्वयन नहीं हुआ तो आयुष्मान भारत एक बुरा स्वप्न बन सकता है. नीतिनिर्धारकों को इन समस्याओं को ध्यान में रखना चाहिए. हमें बेहतर आंकड़ों की भी जरूरत हैं ताकि सही ढंग से विश्लेषण किया जा सके.

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