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हाशिमपुरा के सबक

हाशिमपुरा में हुए नरसंहार हमें भूलना नहीं चाहिए

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

1987 में उत्तर प्रदेश पीएसी द्वारा 38 मुस्लिमों का नरसंहार किया गया था. इसे भूलना नहीं चाहिए. इस घटना के 31 साल बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल में एक फैसला दिया. 1987 की उस घटना से समाज और राजव्यवस्था के लिए क्या सबक हैं, यह समझने की जरूरत है. अदालत ने 16 पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई. इनमें से तीन की मौत पहले ही हो चुकी है. अदालत ने इसे संस्थागत पूर्वाग्रह का मसला बताया.
 
पिछले तीन दशक से सरकार और उत्तर प्रदेश पुलिस समेत प्रदेश की सरकारों का भी ट्रायल हो रहा था. निचली अदालत ने पहले पुलिसकर्मियों को दोषमुक्त कर दिया था. इससे हिरासत में होने वाली मौतों के मामलों में पुलिस की जांच पर भी सवाल उठते हैं. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि पुलिस की पुलिसिंग कौन करेगा? 
 
उच्च न्यायालय ने कहा कि हिरासत में हुई हत्याओं और मानवाधिकार उल्लंघन के इस मामले में कसूरवारों को सजा दिलाने में विफलता स्पष्ट तौर पर दिखती है. यह निराशावादी के साथ-साथ व्यावहारिक भी है कि अगर हाशिमपुरा से कोई सबक नहीं लिया गया तो ऐसी घटनाएं फिर से होंगी. इस मामले में लगे मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकीलों का मानना है कि इस घटना को नीचे के पुलिसकर्मियों ने अपने स्तर पर अंजाम नहीं दिया गया होगा. इसका मतलब यह हुआ कि सजा पाने वाले पुलिसकर्मी ही सिर्फ असली गुनहगार नहीं हैं.
 
जिन संस्थानों से मानवाधिकार रक्षा की संवैधानिक अपेक्षा है, वही उनका हनन कर रहे हैं. दुर्भाग्य से यह कोई बीते जमाने की बात नहीं है. ये एक खास समुदाय को लोग को निशाना बनाने का मामला है. ऐसे में हाशिमपुरा की घटना और इसके सबक पर बातचीत करना वक्त की जरूरत है.
 
हालांकि, इस मामले में पीड़ित परिवारों का न्यायिक तंत्र पर भरोसा बना रहा. मीडिया रिपोर्ट से यह पता चलता है कि जिस क्षेत्र से इन लोगों को पुलिस ने उठाया था, उसे पूरे क्षेत्र की छवि देशद्रोहियों वाली बना दी गई थी. यहां से किसी हथियार के मिलने का सबूत नहीं मिला. जो लोग मारे गए, उनके बच्चों के लिए शिक्षा हासिल करना मुश्किल रहा. भावनात्मक स्तर पर उन्हें जो परेशानी हुई, वह अलग है. कुछ वकीलों ने बगैर थके उनका मुकदमा लड़ा. इससे अंततः यह बात स्थापित हो गई कि पुलिसकर्मियों ने इस नरसंहार को अंजाम दिया था. इस मामले से यह सबक मिलता है कि चाहे जितना भी संघर्ष करना पड़े लेकिन अंत में जीत न्याय की होती है.
इस मामले को भूलना नहीं चाहिए. हिंसा और हत्या के शिकार परिवारों की मांगों की ओर ध्यान देने की जरूरत है. यह तब ही हो सकता है जब जनता समर्थित मीडिया इस घटना के सबक को आगे बढ़ाए जिसकी जांच करने वाले एक पुलिस अधिकारी ने ‘आजाद भारत का सबसे बुरा हिरासती हत्या का मामला’ बताया था.
 
हाशिमपुरा के मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए उनके साझा इतिहास की यह नहीं भूलने वाली घटना है. यह उनके जेहन में दर्ज रहेगा. इसे लोगों की स्मृति भी बनाए रखना होगा. अगर हम इतिहास के सबक को भूल जाएंगे तो फिर से ऐसी घटनाएं होंगी.
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