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लैंगिक न्याय और इसकी बाधाएं

केरल में विरोध कर रही नन के पक्ष में लोगों का आना लैंगिक न्याय को लेकर उम्मीद जगाता है

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पांच नन के विरोध के बाद केरल कैथलिक चर्च नैतिक संकट में है. ये लोग एक नन के उन आरोपों के खिलाफ विरोध कर रही हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि जालंधर के पादरी ने दो साल तक उनका यौन शोषण किया. इससे न सिर्फ यौन अपराधों के प्रति चर्च के रवैये का पता चलता है बल्कि सरकार के रुख का भी अंदाज मिलता है. इससे विरोध की दो बातों को समझना जरूरी है. पहली बात तो यह कि विरोध कर रही पांच ननों ने धार्मिक संस्था के खिलाफ काफी साहस दिखाई है. दूसरी बात यह कि इन्हें काफी लोगों का समर्थन मिल रहा है. मीटू अभियान की पृष्ठभूमि में इस विरोध ने चर्च टू अभियान का रूप ले लिया है. कैथलिक चर्च नई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. लेकिन इन सबके मूल में लैंगिक न्याय का सवाल है.
 
इन जगहों को पवित्र माना जाता है और यह धारणा है कि ये इस तरह से भेदभाव से मुक्त हैं. यही वजह है कि ननों ने साइरो-मालाबार कैथलिक चर्च, एपोसटोलिक ननसियो आॅफ इंडिया और रोम के चर्च अधिकारियों से शिकायत की है. ऐसा लगता है कि चर्च अधिकारियों से कोई जवाब आया लेकिन यह पादरी के पक्ष में था. चर्च का रुख इस मामले में और अनैतिक रहा. नन के चरित्र हनन की कोशिश की गई. चर्च ने पूर्वाग्रह वाली सोच प्रदर्शित की. केरल उच्च न्यायालय ने पादरी की जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया साक्ष्य उपलब्ध हैं. अदालत ने चर्च की आंतरिक जांच पर भी सवाल उठाए हैं.
चर्च ने आंतरिक मामला मानते हुए इसकी जांच कराई थी और कहा था कि समुदाय के अंदर ही इसका समाधान होना चाहिए. चर्च का रुख यह भी था कि ननों की ओर से जो जनसमर्थन की अपील की जा रही है, उससे समुदाय की छवि खराब हो रही है. जाहिर है कि ऐसा करके न्याय का दम घोंटने की ही कोशिश हुई.
 
पितृसत्तात्मक नैतिकता का इस्तेमाल करके दुनिया भर में बलात्मकार पीड़ितों का चुप कराने की कोशिश की जाती है. कई तरह के दबाव बनाकर चुप कराना नया नहीं है. चर्च के आंतरिक ढांचे में नन की स्थिति कमतर है. वहीं पादरी को धार्मिक कानूनों से शक्ति मिलती है. इससे चर्च के अंदर लैंगिक रिश्ते पुरुषवादी हैं. पादरी के खिलाफ आवाज उठाने को चर्च के खिलाफ माना जाता है. इससे विरोध का स्वर खत्म होता है और न्याय की संभावना घट जाती है.
ऐसे में सरकार का दखल अहम हो जाता है. केरल में वोट बैंक पर कैथलिक चर्च का प्रभाव रहा है. केरल में 18.4 फीसदी ईसाई हैं. इनमें से 60 फीसदी कैथलिक हैं. केरल में न तो वाम मोर्चा ने, न ही विपक्ष ने और न ही भारतीय जनता पार्टी ने इस मामले में ननों का साथ दिया. यह चुप्पी वोट बैंक राजनीति की ओर इशारा कर रही है.
 
लेकिन इसके बावजूद लोगों का लैंगिक न्याय के प्रति उत्साह ठंढा नहीं हुआ. ननों के अनिश्चित काल के विरोध को कई वर्गों से व्यापक समर्थन मिला. इससे विरोध करने वालों के पक्ष में माहौल बना. प्रदर्शन कर रही ननों को मिले जनसमर्थन से लैंगिक न्याय के प्रति संघर्ष को मजबूती मिली है. इससे न्याय की राह के पुराने रोड़ों को दूर करने की कोशिशों को मजबूती मिलेगी.

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