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जब ईंधन में आग लगी हो

तेल की वैश्विक कीमतों से भी कहीं ज्यादा ये सरकार की विकृत नीतियां हैं कि उपभोक्ताओं को बहुत ऊंची कीमत देनी पड़ रही है.
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

देश में तेल की लगातार बढ़ती ही जा रही कीमतों से आम आदमी के लिए जो मुश्किलें पैदा हो रही हैं उसे लेकर हमारी सत्ताधारी सरकार का लचर रवैया सामने है. पूरे मुल्क में विपक्षी दल इसे लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और उसे देखकर केंद्र सरकार ने तेल की कीमतों को सुधारने का जिम्मा राज्य सरकारों पर डाल दिया है. राजस्थान और आंध्र प्रदेश की सरकारों ने अपने यहां तेल की कीमतें 2.5 और 2 रुपया प्रति लीटर घटाने की घोषणाएं की हैं और उनको छोड़कर किसी राज्य ने अब तक प्रतिक्रिया नहीं दी है. इतने के बाद भी इन राज्यों की राजधानियों में पेट्रोल की कीमतें 81 से 83 रुपये और 85 से 87 रुपये प्रति लीटर के बीच डोल रही हैं. इसकी तुलना में मुंबई में कीमत 90 रुपये प्रति लीटर है जहां पर वाहन ईंधन पर सबसे ज्यादा मूल्य संवर्धित कर (वैट) है.
 
साल 2010 और 2014 में जो ईंधन की कीमतों का विनियमन हुआ था वो तब सार्थक होता जब वैश्विक कीमतों में गिरावट का फायदा उपभोक्ताओं को मिला होता, ठीक वैसे ही जैसे जब तेल की वैश्विक कीमतें बढ़ती है तो उपभोक्ताओं को भार उठाना पड़ता है. एक कच्चा अनुमान है कि तेल के बड़े (अपस्ट्रीम) खुदरा विक्रेता, डीलरों से जितनी कीमत वसूलते हैं, उत्पाद शुल्क व वैट (बिक्री कीमत का करीब 50 प्रतिशत) और डीलर के कमीशन (बिक्री कीमत का कम से कम 9 प्रतिशत) को मिलाने के बाद उपभोक्ताओं को उससे दोगुनी कीमत देनी पड़ती है. जब तेल की कीमतें वैश्विक स्तर पर बढ़ती हैं (सितंबर 2014 के बाद से अब 80 डॉलर प्रति बैरल की रिकॉर्ड ऊंचाई पर) तो सरकार के लादे गए करों और शुल्कों से बहुत बढ़ी कीमतें उपभोक्ताओं को चुकानी पड़ती हैं, लेकिन यही कीमतें जब कम होती हैं तो उसका फायदा उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचने दिया जाता. जैसे नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के बीच के समय को याद करें. उस अवधि में कच्चे तेल की इंडियन बास्केट की कीमतें 60 डॉलर प्रति बैरल पर गिर गई थी. तब सरकार ने उत्पाद शुल्क नौ बार बढ़ाया. इससे आम पेट्रोल पर ये शुल्क 150 फीसदी तक बढ़ा यानी 19.48 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी. वहीं रेग्युलर हाई स्पीड डीज़ल पर ये शुल्क 330 फीसदी तक बढ़ा यानी 15.53 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी. सरकार ने इस दौरान 2016-17 में उत्पाद शुल्क से 2,42,000 करोड़ रुपये जनता की जेब से झाड़ लिए, वहीं 2014-15 में यही राशि सिर्फ 99,000 करोड़ रुपये थी. प्रशासित कीमतों से दूरी बनाने से राजकोष को जरूर फायदा हुआ है.
 
ये मुश्किल ही लगता है कि सरकार आसानी से आने वाले इस राजस्व का त्याग करेगी. खासकर तब जब 2019 के चुनाव आने वाले हैं. एक तरफ रुपये के अवमूल्यन की वजह से तेल के आयात बिल बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ चूंकि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) पर अभी भी काम जारी है तो कर राजस्व भी पूरी तरह स्थायी नहीं हो पाया है. अभी इन शुल्कों/करों में कटौती का मतलब होगा सरकार की कुछ जन कल्याणकारी योजनाओं का त्याग करके वित्तीय हिसाब बैठाना. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) शासित कई राज्यों में लुभावनी नीति के तहत किसानों के ऋण माफ कर दिए गए हैं. ऐसे में वहां वैट को कम करना बहुत मुश्किल होगा अन्यथा ऋण माफी की रकम के लिए राजस्व कहीं और से लाना पड़ेगा.
 
सरकारें हालांकि तेल की कीमतें बढ़ाने से डरती हैं कि कईं मतदाता नाराज न हो जाए. लेकिन जैसे हमने अप्रैल-मई 2018 के दौरान देखा कि चुनाव पूर्व के दिनों में मतदाताओं को लुभाने के लिए सरकारें पेट्रोल पंप की कीमतों के रोज़मर्रा के संशोधन को रोक देती हैं लेकिन ये रणनीति अब काफी घिस गई है और शायद भविष्य में काम न करे क्योंकि चुनावों के बाद में तेल की कीमतों में तीखी बढ़ोतरी कर दी जाती है. इससे कई सच सामने आ गए हैं. मसलन, इस देश में पेट्रोल और डीज़ल की रोज़ की कीमतें कैसे तय की जाती हैं? इस हफ्ते दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक याचिका को खारिज कर दिया जिसमें ये तर्क जानने के लिए तेल कंपनियों के रिकॉर्ड मांगे गए थे कि वे ईंधन की कीमत कैसे तय करती हैं. तेल की कीमतों के निर्धारण को जैसे छुपाया जा रहा है उससे ये सोचते हुए आश्चर्य होता है कि कर्नाटक चुनाव के दौरान कीमतों को कमी से 500 करोड़ रुपये का "घाटा" होने के अनुमान तक तेल कंपनियां कैसे पहुंचीं, और चुनावों के बाद तेल की कीमतों में बदलाव को कैसे डिजाइन किया जाता है.
 
भारत में तेल की कीमतें ऐसे तय की जाती हैं जैसे कि कच्चे तेल का नहीं, तैयार तेल का सीधा आयात किया जाता हो. हालांकि हकीकत ये है कि भारत तेल का ख़ालिस निर्यातक देश है. 2017-18 में इसका निर्यात मूल्य (2,385.8 करोड़ रुपये) अपने आयात मूल्य (74.4 करोड़ रुपये) से 32 गुना ज्यादा था. ये हुआ रिफाइनरियों की क्षमता में विस्तार की वजह से. लेकिन गलत धारणा की बुनियाद पर रिफानरी गेट प्राइस (आरजीपी) की गणना होती है और इसलिए तेल निर्माण कंपनियां/रिफाइनर ज्यादा जोर तेल के आयात समानता मूल्य को देते हैं. इसी के साथ उपभोक्ताओं को बहुत ऊंची कीमत चुकानी पड़ती है, उतनी कीमत जितनी उनको तब देनी पड़ती अगर भारत कच्चे तेल का नहीं बल्कि तैयार ईंधन का आयात कर रहा होता. इसीलिए जो राष्ट्रीय घाटे (मुनाफे) हैं जिन्हें आमतौर पर "अंडर (ओवर) रिकवरी" बोला जाता है वो दरअसल असल घाटों (मुनाफे) के ज्यादा (कम) लगाए अनुमान होते है.
 
इस देश में तेल की कीमतें आर्थिक प्रक्रिया से कहीं ज्यादा एक राजनीतिक बयान होती हैं. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की जिस सरकार ने 2014 में सत्ता में आने के तुरंत बाद डीज़ल की कीमतों का विनियमन करने का कारोबार अनुकूल रुख लिया था, वही अब आने वाले चुनावों में अपना राजकोषीय गणित सही रखने के लिए तेल उत्पादक कंपनियों के मुनाफों पर अतिरिक्त कर (विंडफॉल टैक्स) लगाना चाह रही है. 70 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जो भी मुनाफा होगा उस पर टैक्स लगेगा, हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि सरकार इस अंक पर कैसे पहुंची. पेट्रोलियम इंडस्ट्री में एक उभरता हुआ असंतोष है कि सरकार के साथ जो उनके पहले से मौजूद राजस्व साझा अनुबंध हैं उन्हें देखते हुए मुनाफों पर लगने वाला टैक्स प्रतिबंधात्मक होगा और नतीजा ये होगा कि उन पूंजी निवेशों (घरेलू-विदेशी दोनों) पर असर पड़ेगा जिसकी तेल खोजने वाली इंडस्ट्री को बहुत जरूरत है. तेल की त्रासदी में फंसा भारत उन पेलिकन बतखों जैसा लगता है जो खाड़ी में फैल गए कच्चे तेल के काले दलदल में पूरी तरह फंस गई थीं.            

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