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क्या सीवर में हुई मौतें अब सामान्य बात है?

सीवर सफाई के लिए व्यापक मशीनीकरण से इंसानों को इन मौत की कोठरियों में प्रवेश करने से रोका जा सकता है.
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

हाल ही में दिल्ली में दो अलग हादसों में हुई छह सीवर सफाई कर्मियों की मौत ऐसी मौतों की श्रंखला का ही हिस्सा है. हालांकि इस पर संबंधित अधिकारियों की जो प्रतिक्रिया है वो दिखाती है कि इसे सामान्य मान लिया गया है. स्वच्छ भारत की अलंकारपूर्ण भाषा के संदर्भ में महत्वपूर्ण समझा जाने वाला गंदगी सफाई का ये काम जिन लोगों को करने के लिए धकेल दिया गया है उनके बारे में बात करते हुए ये सामान्यीकरण अस्वीकार्य और असंवेदनशील है. 
 
गरीबी की मजबूरी इन कर्मियों को नंगे बदन मल और गंदगी से भरे इन नालों में उतरने के लिए मजबूर करती है और ये सब अच्छे से जानते हैं कि दम घुटने से उनकी मौत भी हो सकती है जैसे उनकी तरह दूसरे कर्मियों की हुई है. इन क्रूर मौतों के बाद जो आम सवाल उठता है और जिसका तुरंत जवाब दिया जाना चाहिए वो ये है कि : ये कर्मी इस गंदगी में क्यों उतरते हैं जब सफाई के लिए मशीनें उपलब्ध हैं और कानून भी यही है?
 
सामाजिक कार्यकर्ता और दूसरे लोग जो इन सफाई कर्मियों के लिए सुरक्षा उपकरणों और जीवन जीने के इनके बद्तर हालातों में सुधार की मांग करते आ रहे हैं वो इन लोगों से जुड़े विश्वसनीय आंकड़े न होने का अफसोस करते हैं. देश में कितने सीवर सफाईकर्मी या हाथ से गंदगी साफ करने वाले कर्मी हैं इसका कोई आंकड़ा नहीं है. शायद इसलिए क्योंकि फिर तो ये स्वीकार करने की बाध्यता हो जाती है कि ये काम अभी भी होता है. मीडिया की खबरों और राज्य विधानसभाओं व संसद में दिए गए सरकारी उत्तरों को आधार बनाएं तो ये आंकड़े अलग-अलग और अस्पष्ट हैं. तो इस मसले की प्रमुख बात ये है कि कोई भी व्यक्ति, स्थानीय प्राधिकरण या एजेंसी 2013 में संशोधित 'हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन और शुष्क शौचालय निर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1993' के तहत सीवरों और सेप्टिक टैंकों की जोखिम भरी सफाई के लिए किसी व्यक्ति को रोजगार नहीं दे सकते. 
 
स्पष्ट रूप से, भारत में समाज और अधिकारी लोगों द्वारा महत्व के अनुक्रम को जैसे देखा जाता है उसमें नीची जातियों से आने वाले सीवर कर्मियों की दुर्दशा किसी को नजर नहीं आती. ये लोग ऐसे चेहराविहीन प्राणी हैं जो मामूली पैसों के लिए गलियों में झाड़ू लगाते हैं, नालियां साफ करते हैं, संकरी गटर की नालियां साफ करते हैं, सेप्टिक टैंक और सीवर लाइन साफ करते हैं. जब से स्वच्छ भारत अभियान शुरू हुआ है तब से इस अभियान के जो असल सैनिक हैं उनकी ओर न तो किसी की नजर गई और न ही उन्हें ज्यादा वित्तीय संसाधन मिले. मुंबई में सफाई कर्मियों के संघ 'कचरा वाहतूक श्रमिक संघ' ने कहा कि झाड़ू हिलाते सेलेब्रिटी और मंत्री "अपनी खुद की परछाई ही साफ कर रहे हैं और वो हम हैं जो देश को साफ रख रहे हैं."
 
सबसे नीचे रखी जाने वाली जातियों और दूसरे लोगों के कचरे को साफ करने के काम से यही वो नकली जुड़ाव है कि किसी की इसमें रुचि नहीं और न ही असमान गटरों और नालियों की सफाई के लिए मशीनी उन्नयन लाने के लिए कोई कोशिश कर रहा है. तेजी और बेतरतीबी से शहरीकृत हो रहे इस देश में हमारी सफाई व्यवस्था को चालू रखना शहरों के निर्विघ्न कामकाज के लिए अनिवार्य है. मसलन, बैंगलुरु में अपार्टमेंट ब्लॉक अपना खुद का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट रख सकते हैं और बिना नगर निगम अधिकारियों को शामिल किए इसकी मरम्मत और रख-रखाव का काम करवा सकते हैं. इसका मतलब ये हुआ कि इस काम को करवाने के लिए निजी लोगों और ठेकेदारों को बुलाया जाता है जो ये काम अनियमित सफाई कर्मियों से तदर्थ आधार पर करवाते हैं बिना उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखे. दिल्ली में हाल ही में छह में से उन पांच सीवर सफाई कर्मियों की मौत भी ऐसे ही हुई.
 
सफाई कर्मियों के साथ काम कर रहे एक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि भारत के पास सैटेलाइट लॉन्च करने की तकनीक है लेकिन जमीन में सिर्फ 20 फुट गहरे सेप्टिक टैंकों और सीवर लाइनों को साफ करने की तकनीक नहीं है. लेकिन इस दिशा में कुछ तारीफ के काबिल काम भी हुए हैं. कुछ अन्य तरीकों से देशज मशीनें बनाई गई हैं. जैसे हैदराबाद महानगर जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली जेटिंग मशीनें, या "बंदीकूट" को लॉन्च करने वाला प्रयोग, या केरल के तिरुवनंतपुरम में सामाजिक रूप से जागरूक इंजीनियरों द्वारा बनाई गई रोबोटिक मशीनें, या हैदराबाद के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों द्वारा बनाया गया "सीवर क्रॉक" या फिर ऐसे की दूसरे प्रयास जिन्हें मीडिया में प्रकाशित नहीं किया गया है. ये ठीक वैसे ही प्रयास हैं जिनका संबंधित अधिकारियों को बढ़ृ-चढ़कर समर्थन करना चाहिए और उनकी खुशी मनानी चाहिए. दिल्ली सरकार ने भी नालियों और सीवरों की मशीनों द्वारा सफाई के लिए कार्य योजना प्राप्त कर ली है. खबरों में आया है कि सफाई कर्मचारियों को "उद्यमी" बनाने का प्रस्ताव है जिसके तहत सीवर साफ करने वाली मशीनें खरीदने के लिए उनको ऋण मुहैया करवाया जाएगा. इससे इन लोगों के लिए बहुत दिक्कतें हो जाएंगी इसलिए सरकार को ये मशीनें खरीदनी चाहिए और उन्हें संचालित करने के लिए लोग नियुक्त करने चाहिए.
 
एक बात कही जाती है कि इन कर्मचारियों को समुचित सुरक्षा उपकरण दिए गए हैं. शिकायत ये है कि ये उपकरण इतने भारी हैं और न मुड़ने वाले हैं कि सफाई कर्मी इनको उतारकर ही काम करना पसंद करते हैं. यहां भी प्रयास ये होने चाहिए थे कि लगातार प्रयोग किए जाते और उनके लिए हल्के सेफ्टी सूट लाए जाते. लेकिन क्या अधिकारी लोग इन कर्मियों की जिंदगी को इतना कीमती मानते हैं कि ऐसे प्रयासों में धन लगाएंगे? मशीनीकृत सफाई के साथ ही एक समस्या सीवर कर्मियों को ठेके पर नौकरी देने की भी है. सरकार खुद ही, खासकर रेलवे में, ठेके के आधार पर काम की सबसे बड़ी उपयोगकर्ता है. सफाई कर्मियों का काम महत्वपूर्ण और बारहमासी है, उसके बावजूद ये सब धड़ल्ले से चल रहा है.
 
इस सरकार का जो अपनी बड़ाई करने वाला और योग्य उद्देश्य, तकनीक व नई खोजों की ताकत को सहेजने का है, उसे इस ओर भी मोड़ा जा सकता है ताकि सफाई कर्मियों की अनावश्यक और क्रूर मौतों को टाला जा सके.
 
 
 

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