ISSN (Print) - 0012-9976 | ISSN (Online) - 2349-8846

कोई अर्बन नक्सली कैसे बनता है?

बर्नार्ड डिमैलो ईपीडब्ल्यू के संपादकीय सलाहकार हैं और "इंडिया ऑफ्टर नक्सलबाड़ीः अनफिनिश्ड हिस्ट्री (2018) के लेखक हैं.

बर्नार्ड डिमैलो अपने पूर्व-साथी और "अर्बन नक्सली" गौतम नवलखा के बारे में लिखते हैं.

 
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार और हिंदुत्ववादी "राष्ट्रवादी" आंदोलन का अपनी सांस्कृतिक कट्टरता के लिए ऐसा शैतानी अभियान चल रहा है जिसकी सीमा नहीं है. इसमें भी बहुत चिंता की जो बात है वो सरकार का दिया गया समर्थन है और हिंदुत्ववाद के नाम पर हो रही चीजों में उसकी सहभागिता है. साथ ही चिंतित करने वाला है भारत सरकार का सत्ता के आतंक के जरिए अपने "आवश्यक" शत्रुओं पर नियंत्रण. जैसे ऐसे ही अभियानों (जून और अगस्त 2018) में इसने हाल में "अर्बन नक्सलियों" की श्रेणी को अलग से निशाना बनाया जबकि पहले वो नियमित रूप से मुसलमानोंआतंकवाद से उत्पीड़ित राष्ट्रीयता वाले लोगों और "माओवादियों" पर निशाना बनाती रहती थी. सरकार के इस "अर्बन नक्सली" के वर्गीकरण में अब तक वकीलनागरिक अधिकार कार्यकर्ताकविलेखकपत्रकार और प्रोफेसर आए हैं जिन्हें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) (माओवादी) के "सक्रिय सदस्य" समझा गया है.

 

अगस्त में जिन पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया है उन पर अन्य आपराधिक कानूनों के अलावा गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धाराएं लगाई गई हैं. इन "अर्बन नक्सलियों" और कुछ अन्य लोगों को जिन्हें सरकार सताना और डराना चाहती थी उनके घरों और दफ्तरों पर छापे मारे गए. इसमें इनको हानि पहुंचाने और बदनाम करने की नीयत साफ दिखी जब भारत में "गोदी" मीडिया के कुछ वर्गों ने प्राइम टाइम टेलीविजऩ पर इन लोगों को खुलेआम डराते हुए आरोप लगाए. इनमें से कुछ "दोषियों" को सार्वजनिक रूप से "देश द्रोही", "राष्ट्र के अदृश्य शत्रु", "भारतीय लोकतंत्र को गंभीर खतरा" और सीपीआई (माओवादी) की मदद करने वाले" करार दिया गया.

 

इन्हीं मान लिए गए "राष्ट्र के अदृश्य शत्रुओं" और "भारतीय लोकतंत्र को गंभीर खतरों" में से एक इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) के सम्मानित पत्रकार गौतम नवलखा भी हैं. नवलखा 1980 के दशक के शुरू में ईपीडब्ल्यू में आए. भारत में जिन सर्वोत्कृष्ट पत्रकारों को मैं जानता हूं उनमें शुमार रजनी देसाईएम एस प्रभाकर और कृष्ण राज के साथ नवलखा ने काम किया. इस दशक में जब बाद में उन्होंने अपना घर दिल्ली में स्थानांतरित कर लिया तो भी वो ईपीडब्ल्यू के लिए काम करते रहे और उसके संपादकीय सलाहकार बना दिए गए. उस हैसियत से वो2006 तक काम करते रहे. उसके बाद उन्होंने तब के संपादक सी राममनोहर रेड्डी से अनुरोध किया कि उन्हें उनकी औपचारिक जिम्मेदारी से आजाद कर दिया जाए क्योंकि वे पीपुल्स यूनियन फॉर डैमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) के साथ जुड़कर एक लोकतांत्रिक अधिकार कार्यकर्ता के तौर पर ज्यादा समय देना चाहते थे. लेकिन वे उसके बाद भी ईपीडब्ल्यू के लिए लिखते रहे हैं.

 

फिर 1990 के दशक के शुरू में नवलखा की लेखनी में कुछ बेहद विशिष्ट सा आकार लेने लगा. तब वो 'जम्मू कश्मीर नागरिक समाज गठबंधन' (कोएलेशन ऑफ सिविल सोसायटी) के साथ करीब से जुड़ गएउनके अभियानोंउनकी तथ्य-ढूंढ़ने वाली टीमों में हिस्सा लेने लगे और उनके लिए रिपोर्ट लिखने लगे. वो सच को लेकर बहुत अधिक प्रतिबद्ध रहे हैं जो अधिकतर कश्मीर की अचिन्हित कब्रों की मिट्टी में दफ्न है. नवलखा ने ईपीडब्ल्यू और दूसरी मैगजीनों में जो लिखा उससे वो पत्ते उड़ गए जिनका इस्तेमाल भारतीय सरकार ने कश्मीर में मानव अधिकार के मोर्चे पर अपने बुरे रिकॉर्ड को ढकने के लिए इस्तेमाल किया था. मसलनवहां लोगों को जैसे जबरन लापता किया गया हैनकली एनकाउंटरों में उसके बाद जो हत्याएं हुई हैं और सेनाअर्धसैन्य बलोंपुलिस अधिकारियों को अपने कृत्यों के लिए जो कानूनी सुरक्षा मिली हुई है.

 

नवलखा अपने पाठकों को भारतीय लोकतंत्र का जो झूठ दिखाते आ रहे हैं वो कश्मीर में प्रत्यक्ष है. नवलखा जैसा पत्रकार और मानव अधिकार कार्यकर्ता होने के लिए बहुत हिम्मत की जरूरत पड़ती है. खासकर तब जब आपको पता है कि सत्ता का कुप्रचार करने का तरीका क्या है और विशाल "गोदी" मीडिया भी उसी की तरफ है. हिंसा के पीड़ितों को ही हिंसा के लिए लगातार दोषी ठहराया जाता है और गुस्से में भरे पाठक आपको सुनने तक के लिए तैयार नहीं होते. यहां तक कि भारत के संसदीय वामपंथ के कुछ धड़े भी नवलखा को "पथभ्रमित" कहते हुए कश्मीर पर उनके लेखन को खारिज करते हैं. लेकिन नवलखा तथ्यों और तर्कों के आधार पर अपनी जगह कायम रहे हैं और उन्होंने भारत-प्रशासित कश्मीर में आंतरिक उपनिवेशवाद का नरक रचने के लिए भारत सरकार को दोषी ठहराना जारी रखा है.

 

एक मार्क्सवादी-समाजवादी होने के लिए इंसान को हर तरह के ज़ुल्म के खिलाफ विरोध करना ही चाहिएभले ही वो प्रजातीयराष्ट्रीयजातीयवर्गीयनस्लीय या लैंगिक आधार पर ज़ुल्म हो. मार्क्सवादी-समाजवादी मूल्यों के केंद्र में ये बात है. मार्क्सवाद असल में दबे-कुचले लोगों का दर्शन है. सर्वहारा काअर्ध-सर्वहारा का और उनमें भी गरीब किसान वर्ग के लोगों का. मार्क्सवाद ताकत की फिलॉसफी नहीं हैये समानता की फिलॉसफी है जो नवलखा ने आत्मसात की और उसका अभ्यास किया. उनकी पत्रकारीय और मानव अधिकार जांचें उनको दक्षिणी छत्तीसगढ़ में माओवादी विद्रोह के केंद्र में ले गई जहां सितंबर 2009 से ही भारत सरकार ने ऑपरेशन ग्रीन हंट नाम से युद्ध छेड़ रखा है.

 

यहां पर नवलखा ठीक वैसे ही रहे हैं जैसे अमेरिकी पत्रकार एडगर स्नो 1930 के दशक के चीन में रहे थे. उनकी किताब "रेड स्टार ओवर चाइना" 1938 में प्रकाशित हुई थी. स्नो ने जब चीन की सीमा में प्रवेश किया तो तथ्यों को वैसे ही दिखाया जैसे उन्होंने स्वयं देखा. उन्होंने चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मीचीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओंउनके कार्यक्रमों और नीतियों की तथ्यपरक रिपोर्टिंग की. नवलखा की 2012 में आई किताब "डेज़ एंड नाइट्स इन द हार्टलैंड ऑफ रिबैलियन" में तथ्यों को वैसे ही बताया है जैसा दक्षिणी छत्तीसगढ़ के माओवादी गुरिल्ला बेस में उन्होंने देखा. इस गृह युद्ध पर अपनी समझ के आधार पर नवलखा भारत सरकार और सीपीआई (माओवादी) दोनों से कहते रहे हैं कि वे 1949के जिनेवा सम्मेलन की धारा 3 और गैर-अंतर्राष्ट्रीय सशस्त्र संघर्ष से जुड़े 1977 के प्रोटोकॉल-2 को स्वीकार कर लें.

 

तो फिर "अर्बन नक्सली" का क्यानवलखा के किए हुए कार्यों को ज़ेहन में रखते हुए मैं एक "नक्सली" को इस तरह परिभाषित करता हूं. एक नक्सली वो होता है जो ये जानने में बाद दुखी हुए बगैर नहीं रह सकता कि अधिकतर भारतीय आज भी पेट भर खाना नहीं खा पातेजिनके पास पहनने को पर्याप्त कपड़े नहीं हैंउनके घर टूटे-फूटे हैं, वे शिक्षित नहीं हैं और ठीक-ठाक चिकित्सकीय सेवा तक भी उनकी पहुंच नहीं है. उसे महसूस होता है कि ये जो हालात हैं ये भारत की बेहद गहरी दमनकारी और शोषणकारी सामाजिक व्यवस्था की वजह से उपजे हैं और इसमें क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत है. मेरा नजरिया ये है कि शब्द के इस मायने में बहुत सारे भारतीय नक्सली ही हैं चाहे शहरी हों या ग्रामीण. जैसे मैं और नवलखा हैं. और ऐसा नक्सली होने के लिए आपको सीपीआई (माओवादी) का सदस्य या समर्थक होने की जरूरत नहीं है.

 

 

Comments

(-) Hide

EPW looks forward to your comments. Please note that comments are moderated as per our comments policy. They may take some time to appear. A comment, if suitable, may be selected for publication in the Letters pages of EPW.

Back to Top