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नए आरक्षणवादियों का उदय

आरक्षण के लिए ताजा मांगों में नौकरियां पैदा करने की मांग भी शामिल होनी चाहिए.

 
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

आरक्षण कोटा में नई जातियों को शामिल करने की देश भर में बढ़ रही मांग ने एक रोचक चरण में प्रवेश कर लिया है. विरोधियों ने आरक्षण नीति को जैसे बदनाम किया, यह चरण उसमें लोगों का भ्रम दूर करना चाहता है. ठीक उसी समय,इसने आरक्षण के कुछ सबसे कट्टर विरोधियों की आलोचना का ध्यान संस्थागत बेहतरी से हटाकर देश के ज्यादा अमूर्त स्तर पर ले जाने को मजबूर किया है. कुछ दशक पहले तक ये विरोधी लोग आरक्षण के सिद्धांत को बदनाम करना चाहते थे. वे इसके लाभार्थियोंखासकर अनुसूचित जातियों (एससी) का जिक्र करते हुए उनके लिए सरकार के 'दामाद', 'मैरिट के दुश्मनऔर 'दक्ष कामकाज की राह में रोड़ेजैसी नैतिक रूप से अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते थे. ऐसे में इस दुर्भावनापूर्ण आलोचना का निशाना स्पष्ट रूप से एक सामाजिक समूह था. इन विरोधियों ने आरक्षण के बजाय एक खास समूह के खिलाफ अपनी घृणा और गुस्से का इज़हार करने के लिए संस्थागत बेहतरी जैसे जनहित को बहाना बनाया. एक खास समूह को इस तरह कलंकित करने की प्रक्रिया में लोगों में ये धारणा बैठी कि ये किसी व्यक्ति विशेष या समूह की बात थोड़े ही कर रहे हैं वे तो देश की भलाई की बात कर रहे हैं. इस तरह की आलोचना से सुझाया ये जा रहा था कि आरक्षण के बिना ही मैरिट और योग्यता को सरकारी संस्थानों में स्थापित किया जा सकता है. मंडल-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान भी आरक्षण नीति को बदनाम करने के लिए नैतिक रूप से अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया.

 

आज जब कई जातियों में आरक्षण की मांग बढ़ रही है तब यही विरोधी लोग सार्वजनिक रूप से बात करते हुए 'मैरिट'और 'योग्यताजैसे शब्दों का उपयोग दबे-छुपे तौर पर कर रहे हैं. हालांकि भूमिगत तौर पर या सोशल मीडिया पर आरक्षण के खिलाफ भाषा ज़हरीली ही बनी हुई है. ये याद रखने की बात है कि आरक्षण कोटा का विरोध मैरिट और योग्यता के आधार पर कम है और देश के विकास व समाज के एकीकरण के नाम पर ज्यादा है. इस बढ़ती मांग के खिलाफ उनका तर्क इस चिंता से पैदा हुआ है कि जातिगत आरक्षण से जातिवाद खत्म होने के बजाय बढ़ेगा ही. हालांकि जिस सवाल का जवाब दिया जाना चाहिए वो ये है कि इन विरोधियों ने अब मैरिट और योग्यता जैसे शब्दों के खिलाफ दोषदर्शी रवैया क्यों अख़्तियार कर लिया है?

 

संस्थानों में तो स्वयं ही भर्तियों को लेकर संकट है. पहली बात तो ये कि सरकारी नौकरियों में भर्तियां हो ही नहीं रही हैं और जहां हो भी रही हैं तो मौजूदा व्यवस्था के अंतर्गत वहां मैरिट के बजाय विचारधारा का दबदबा है. दूसरी बात ये कि जो लोग पहले आरक्षण को मैरिट और योग्यता व कुशलता जैसे मूल्यों के आधार पर संस्थागत बेहतरी के लिए बुरा मानते थे वो अब इन्हीं मूल्यों को आरक्षण में लागू पाते हैं. इन मूल्यों को लेकर इस स्वीकारोक्ति को उनकी आरक्षण की मांग के साथ ही पढ़ा जाना चाहिए. इस विमर्श में जो नया मोड़ आया है उसने आरक्षण के सिद्धांत से उस बदनामी को अलग करने में मदद की है जिसे एससी के साथ जोड़ा गया था. यह एक उपलब्धि ही है क्योंकि ये देखना संतोषजनक है कि आरक्षण की मांग का ये लोकतंत्रीकरणआरक्षण की व्यवस्था के खिलाफ जो कड़वा और दुर्भावनापूर्ण गुस्सा था उसे खत्म कर देगा. और कुछ लोगों का तो ये भी मानना है कि ये स्वागत योग्य बात है क्योंकि इससे वो सामाजिक तनाव कम होगा जो भारत में कई जाति समूहों के बीच व्याप्त है. हालांकि सरकार से जो ये मांगें की जा रही हैं उनको असल में मनवाने और ठोस कदम उठाने के लिए संबंधित सरकारों पर प्रभावी रूप से दबाव नहीं डाला जा पा रहा है.    

 

इन सामाजिक समूहों को आरक्षण दिलाने के लिए जाति और समुदाय के आधार पर जो भीड़ जुट रही है वो संबंधित सरकारों के लिए अभी तो चिंता की बात नहीं है. क्योंकि इस भीड़ का इरादा आरक्षण के रास्ते नौकरियां पाने पर ज्यादा है और ज्यादा नौकरियों के निर्माण के लिए मौलिक मांग करने पर कम है. चूंकि इस तरह की आधारभूत मांग नहीं है इसलिए इन सरकारों को पैंतरेबाजी करने का मौका मिल जाता है. वे प्रदर्शनकारियों को वायदे कर देती हैं और उसके बाद इस मामले पर न्यायिक स्थिति क्या है उसे लेकर अपने पैर घसीटती रहती हैं. विडंबना की बात है कि इस आंदोलन की जो दिशा है उससे ही सरकार को अवसर मिलता है कि वो इस मामले पर खेल खेलती है और समस्याओं का कोई मुकम्मल समाधान नहीं देती. ऐसे में सरकार संभव और असंभव के बीच कई तरह के रुख अख़्तियार कर सकती है. उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र सरकार की बात कर सकते हैं. वो मराठाओं को 16 प्रतिशत आरक्षण देने की बात खुलेआम कह रही है लेकिन ठीक उसी समय अदालत से रोक भी ले आई है और ये सरकार के पक्ष में काम करेगा. अलग-अलग राज्यों के जो ये नए आरक्षणवादी हैं उनका ध्यान ज्यादा नौकरियां पैदा करने को लेकर सरकार पर दबाव डालने की जरूरत पर पूरी तरह केंद्रित नहीं है. इन समूहों को शुरुआत तो कम से कम ऐसे करनी चाहिए कि सरकार पर अनिवार्य दबाव डाले ताकि कई स्तरों पर जो 24 लाख सरकारी नौकरियां खाली हैं उन्हें तो भरा जा सके.

 

बजाय उसके आरक्षण में शामिल करने की भारी मांग सिर्फ अवसर के एकमात्र दायरे पर ही बहुत अधिक दबाव ले आती है. उत्तर भारत में जाट और गुर्जरपश्चिमी हिस्से में मराठा;दक्षिण में कापू, कृषि से जुड़ी इन जातियों के वो लोग जिनको खेती से जुड़ी गतिविधियां बेहतर विकल्प नहीं लगती हैं, उन्होंने ज्यादा से ज्यादा शिक्षा के रास्ते को चुना है. लेकिन बाद में उन्होंने यही पाया है कि अवसरों के मामले में उन्हें पहुंचने में देर हो गई. वो अवसर जो या तो हैं ही नहींऔर अगर हैं भी तो बहुत ही कम संख्या में. नए आरक्षणवादियों से उम्मीद है कि वे साथ-साथ सरकार पर ज्यादा नौकरियां पैदा करने का दबाव डालें. ये कहने की जरूरत नहीं कि आरक्षण के लाभ तभी साकार हो पाएंगे जब नौकरियों में असल अवसर भी होंगे. असल अवसर तब आएंगे जब ज्यादा अच्छी नौकरियों के अवसर पैदा होंगे.

 

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