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किफायती दवाओं और उनकी पहुंच में संतुलन

बिना आपूर्ति प्रबंधन रणनीतियों के लोगों तक सस्ती दरों में जरूरी दवाइयों की पहुंच नहीं हो पाएगी.

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

भारत में स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था की पहचान करनी हो तो ये एक खूंखार रूप से फैल रहा निजी क्षेत्र है और इसके ऐसे आउट ऑफ पॉकेट (ओओपी) यानी प्रत्यक्ष चिकित्सा व्यय हैं जिनके कारण से लोगोंखासकर गरीब व कमजोरों की चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच बाधित होती है. या तो वे इतने मोटे खर्चे वहन नहीं कर सकते या फिर इन स्वास्थ्य सेवा खर्चों के बोझ तले वो और भी गरीब होते जाते हैं. इसमें भी सबसे चिंताजनक तो तेजी से बढ़ रही चिकित्सा संबंधी लागतें हैं जिनकी वजह से समय के साथ घरेलू उपभोक्ता व्ययों में स्वास्थ्य सेवा खर्चों का हिस्सा भी बढ़ा है. भारत में सभी स्वास्थ्य सेवा खर्चों का करीब 40 प्रतिशत (2/5) खर्च और कुल निजी ओओपी स्वास्थ्य सेवा लागतों का आधा खर्च चिकित्सा संबंधी होता है. इस संदर्भ में केंद्र सरकार के जरूरी दवाओं की कीमतों के नियंत्रण के लिए उठाए गए कदम स्वागतयोग्य है. जैसे 2013 का नया दवा मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ) या फिर जन औषधि केंद्रों की संख्या बढ़ाते हुए जेनेरिक दवा योजना का प्रस्तावित विस्तार. हालांकि ये कदम कितने प्रभावी हो पाएंगे ये बहस की बात है.

 

जरूरी दवाओं की कीमतें मौजूदा और पिछली केंद्र सरकारों के लिए भी चिंता का विषय रही हैं. लेकिन विभिन्न सरकारों ने समय समय पर इसे लेकर सिर्फ वायदे ही किए हैंकानूनी स्तर पर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे गरीब को मुफ्त दवाएं सुनिश्चित करवाई जा सकें. अब तक जो हासिल किया गया है वो ये कि कुछ राज्य स्तर की पहलें शुरू की गईं और केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के माध्यम से मुफ्त दवाएं व निदानकारी सेवाएं शुरू करने के लिए राज्यों को कुछ प्रोत्साहन ऑफर दिए हैं. इस लिहाज से इस नीति के स्वर में ऐतिहासिक रूप से 'मूल्य नियंत्रणकी प्रबलता रही है जो अभी तक देश के घरेलू दवा बाजार के एक चौथाई से भी कम हिस्से को घेर पाई है. इसके अलावा दवा मूल्य नियंत्रण के अनुभव भी खास नहीं रहे हैं. नवंबर 2017 में जब राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण ने शिशुओं की मूत्रवर्धक दवा फ्यूरोसेमाइड (लेसिक्स ब्रांड) की हर गोली की अधिकतम हद 0.29 रुपये जारी की तो इसकी कीमत हर पैकेट पर 100 से 110 रुपये तक कम हो गई और दवा उद्योग ने इसका कड़ा जवाब देते हुए इस दवा की आपूर्ति में कटौती कर दी.

 

एक तरफ तो भारत में दवाओं की कीमतों को काबू में करने के लिए सबसे बड़ी बाधा हमारे घरेलू दवा बाजार का ढांचा है जो शीर्ष की 10 कंपनियों के आस-पास केंद्रित है और कुल बिक्री में इन कंपनियों का हिस्सा 40 फीसदी (2/5) से भी अधिक रहता है. ऐसे ढांचे में नए डीपीसीओ ने जो बाजार आधारित मूल्य निर्धारण तंत्र प्रस्तावित किया है वो बहुत संभव है कि नियामक पकड़ के प्रभाव में आ जाए. प्राइस कैप यानी मूल्य सीमाएक दवा क्षेत्र में 1 प्रतिशत से अधिक बाजार हिस्सेदारी रखने वाले सभी ब्रांड की कीमतों का औसत होती है. इसमें खतरा ये होता है कि दवाओं की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ाई जा सकती है अगर बड़ी कंपनियां साथ मिलकर विनियमन से पहले की अवधि में विनियमित सूत्रीकरण की कीमत बढ़ा लें. बाजार आधारित सीलिंग प्राइस की बात करें तो टाइप 2 डायबिटीज़ का उपचार करने वाली दवा मेटफॉर्मिन उस लागत आधारित मूल्य निर्धारण तरीके से करीब तीन गुना ज्यादा महंगी है जिसका पालन डीपीसीओ1995 द्वारा किया जाता थावो भी तब जब ये लागतों की घोषणा खुद दवा उत्पादकों ने की थी.

 

दूसरी तरफ आपूर्ति श्रंखला प्रबंधन की अपूर्णता ऐसी है कि वो कम कीमत की जेनेरिक दवाओं के उपयोग को बढ़ने से रोकती है. ऐसी बहुत सी मीडिया रिपोर्ट हैं जिनमें बताया गया है कि मौजूदा जन औषधि केंद्रों की हालत खस्ता है क्योंकि दवाएं प्राप्त करने में देरी होती हैं और आपूर्ति में कोई नियमितता नहीं है. गलत पूर्वानुमानपुरानी खरीद प्रणालियों और छोटे बाजारों जैसे तत्व आपूर्ति में रोड़े अटकाने का काम कर सकते हैं. वहीं दूसरी ओरजेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता को लेकर स्पष्टता न होने की वजह से मांग में अड़चन आ जाती है. देश में दवा नियामक व्यवस्थाओं के प्रमुख हिस्से राज्यों द्वारा नियंत्रित होते हैं इसलिए इसे लागू करने का कोई सुसंगत मानक नहीं है. इसके अलावा नकली दवाओं के हैरान करने वाले आंकड़े उपलब्ध है. दवा निर्माताओं का अनुमान है कि बड़े शहरी बाजारों में बिकने वाली सभी दवाओं में करीब20 प्रतिशत ऐसी हैं जिनकी गुणवत्ता कमतर है या वो दवाएं नकली हैंवहीं सरकारी अनुमान ये कहते हैं कि देश में पूरे दवा बाजार में 10 प्रतिशत दवाएं ऐसी हैं. इसमें और भी चिंतित करने वाली बात ये है कि जो आम धारणा है कि कम कीमत वाली दवाओं के नकली होने की संभावना ज्यादा होती है उसे भी झुठलाना पाना मुश्किल है.

 

भारत का जो यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज ढांचा है वो समानतापहुंच और किफायत जैसे सिद्धांतों पर आधारित है. और इन लक्ष्यों को पूरा करना है तो जाहिर तौर पर इसके लिए कुछ सामाजिक अदला बदली भी करनी ही होगी. मसलनसार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लिए मौजूदा सरकार द्वारा प्रस्तावित बीमा आधारित वित्त व्यवस्था. अब जहां ये कार्यक्रम गरीब तक स्वास्थ्य सेवा की पहुंच सुनिश्चित कर सकता है लेकिन हो सकता है ये उसकी सस्ती दर न सुनिश्चित कर सके. ज़रूरी स्वास्थ्य सेवा के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की आपूर्ति को मजबूत करने जैसी आपूर्ति पक्ष की अनुकूल रणनीतियों के अभाव में ये कार्यक्रम निजी कंपनियों को ही मदद करेगा जो पहले ही भारत के स्वास्थ्य सेवा प्रावधानों पर दबदबा रखती हैं. ऐसी स्थिति में 'मूल्य नियंत्रणशायद जरूरी दवाओं की कीमतों को काबू में रख ले लेकिन तभी जब उसमें आपूर्ति पक्ष के दखल दिए जाएं - जैसे एक दवा नियामक प्रणाली लागू करनाआपूर्ति श्रंखला प्रबंधन को सुधारना और दवा बाजार को समझना. अन्यथा मूल्य नियंत्रण लोगों तक सस्ती दवाओं की पहुंच को खराब कर सकता है.

 

इन लक्ष्यों के बीच सही संतुलन साधन सिर्फ एक आर्थिक फैसला नहीं हैबल्कि ये राजनीतिक इच्छाशक्ति की बात भी है. ये बहुत स्पष्ट तौर पर साबित हो चुका है कि सरकार द्वारा मुफ्त और कम कीमत की स्वास्थ्य सेवा प्रदान करना ही परिवारों के स्वास्थ्य और बेहतरी को बढ़ाने का सर्वोत्कृष्ट रास्ता है. बस इसके लिए जरूरी ये है कि बुनियादी ढांचे से जुड़ी रुकावटों को संबोधित किया जाए और कम कीमत की दवाएं और निदान सेवाएं सभी के लिए मुहैया करवाई जाएं. हालांकि स्वास्थ्य सेवा में मांग-पक्ष के वित्त-पोषण की तरफ जो मौजूदा बड़ा बदलाव है वो इस बात का संकेत है कि मौजूदा सरकार स्वास्थ्य सेवा तक सबकी पहुंच उपलब्ध करवाने में अपनी भूमिका को कम करने में लगी है और ऐसी सेवाओं की आपूर्ति उसने निजी क्षेत्र पर छोड़ दी है.

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