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जब 'रक्षक' ही भक्षक बन जाएं

आश्रय घरों में कमज़ोरों की सुरक्षा करने की अपनी भूमिका में सरकार और नागरिक समाज दोनों ही असफल रहे हैं.

 

एक असमान और पितृसत्तात्मक समाज में सामाजिकसांस्कृतिक और आर्थिक हालात ऐसी स्थिति का निर्माण कर देते हैं कि बच्चों और महिलाओं जैसे आसानी से आघात पहुंचाए जा सकने वाले समूहों को रक्षा की ज़रूरत पड़ती है ताकि शिकारी मानसिकता वाले अपराधी उनको निशाना न बना सकें. हालांकि हमारा कल्याणकारी राज्य और नागरिक समाज जिन पर इनकी सुरक्षा करने का जिम्मा है वो भी इन कमजोर लोगों का उनके अपने संस्थानों में ही उत्पीड़न नहीं रोक पाए हैं. हाल ही में बिहार और उत्तर प्रदेश में बाल देखभाल संस्थानों (सीसीआई) और आश्रय गृहों में नाबालिगों और महिलाओं के शारीरिक और यौन शोषण की घटनाओं ने इसे साबित किया है. ये न्याय का कैसा उपहास है कि बार-बार रक्षा करने वाले ही उनके साथ अपराध करने वाले निकले. ये सब 'किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 2015 लागू होने के बाद भी हुआ और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के रहते हुए हुआ है.

 

बिहार के मुजफ्फरपुर में एक बाल देखभाल संस्थान में यौन शोषण का खुलासा टाटा समाज विज्ञान संस्थान के दल ने किया किया था जिसने 2017 में वहां सामाजिक ऑडिट किया था. इस बाल देखभाल संस्थान में 42 बच्चों में से 34नाबालिग बच्चियां थीं जिनकी उम्र 7 से 17 के बीच थी. पाया गया कि इनका शारीरिक और यौन उत्पीड़न हुआ है. इसी ऑडिट की बदौलत बिहार के 14 अन्य बाल देखभाल संस्थानों में भी शारीरिकमानसिक और यौन शोषण की हकीकत सामने आई. इन आश्रय गृहों में रहने की स्थितियां निंदनीय थीं और बच्चों को बुनियादी आजादियां तक नहीं दी गई थीं. विचलित करने वाली बात ये है कि मुजफ्फरपुर मामले के आरोपियों में से सात "परामर्शदाता" और "देखभालकर्ता" महिलाएं हैं. नाबालिगों के साथ यौन शोषण का इसी तरह का एक और मामला उत्तर प्रदेश के देवरिया में तब उजागर हुआ जब एक 10 साल की बच्ची संस्थान से बच निकलने में कामयाब हो गई. उसने पुलिस को बताया कि उस आश्रय गृह में बच्चों के साथ कैसा शोषण और हिंसा की गई. कथित तौर पर 18 बच्चियां अब भी गायब हैं. और बताया जा रहा है कि ये संस्थान बिना वैध पंजीकरण के चल रहा था.

 

इस मौजूदा दुर्दशा की नौबत इसलिए नहीं आई कि कानूनों की कमी है बल्कि ये इसलिए हुआ क्योंकि निगरानी नहीं रखी गई और जांच समितियां नहीं थीं. किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत हर बाल देखभाल संस्थान का पंजीकरण अनिवार्य है और हर जिले में एक बाल सुरक्षा अधिकारीएक बाल देखभाल समिति और एक किशोर न्याय बोर्ड होना चाहिए. हालांकि व्यावहारिक स्तर पर इनकी सक्रियता इतनी प्रभावी नहीं रही है कि संस्थान चलाने वाले लोगों द्वारा ताकत और पैसे का धड़ल्ले से चल रहा दुरुपयोग रोक सकें. एनसीपीसीआर का एक सर्वेक्षण दिखाता है कि किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत केवल 32 प्रतिशत बाल देखभाल संस्थान ही पंजीकृत थेवहीं 33 प्रतिशत किसी भी प्राधिकारी के पास पंजीकृत नहीं थे. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय अपनी समेकित बाल संरक्षण योजना के तहत इन संस्थानों को धन प्रदान करता है और ये उसका फर्ज है कि गड़बड़ियों को रोकने के लिए सामाजिक ऑडिट करवाए. हालांकि या तो बिना किसी नियमित जांच के इन संस्थानों को चलने दिया जा रहा हैया फिर मुजफ्फरपुर बाल देखभाल संस्थान की तरह होता है कि बड़े पैमाने पर गड़बड़झाला सामने मौजूद होने के बाद भी बहुत सी सरकारी एजेंसियों को अपने निरीक्षणों में कुछ भी गलत नहीं मिला.

 

हालांकि अब एनसीपीसीआर ने सभी बाल देखभाल संस्थानों में सामाजिक ऑडिट पूरे करने के आदेश दे दिए हैं. राज्य सरकारों ने भी जांचों के आदेश दे दिए हैं. लेकिन ये सब उन अनगिनत जिंदगियों के लिए बहुत देर से उठाए गए कदम हैं जो अपने ही "संरक्षकों" के द्वारा तिल-तिल कर बर्बाद और प्रताड़ित की जाती रही. इन जांचों के बाद शोषण के कई मामले सामने आए हैं और कई आने बाकी हैं.

 

मुजफ्फरपुर मामले की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने आश्रय गृहों में रह रहे बच्चों की सुरक्षा और सलामती को लेकर चिंता जताई है. एनसीपीसीआर के सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में इन बाल देखभाल संस्थानों में अभी 1,575नाबालिग ऐसे हैं जो यौन शोषण में से बचकर निकले हैं. ये बच्चे यौन हिंसा से बचकर निकले और इन आश्रय गृहों में फिर से उसी का शिकार हो गए. जहां इस मामले में दंडात्मक कदम उठाने जरूरी हैं लेकिन अकसर देखा जाता है कि सरकारें बस इतना ही करके रह जाती हैं. ऐसे में जब इस मसले को लेकर हंगामा खत्म हो जाए तब भी बच्चों और औरतों की स्थिति को बेहतर करने के लिए प्रयास हो और आश्रय गृहों के कामकाज पर नियंत्रण रखा जाए ताकि फिर से वो भटके नहीं.

 

अकसर इन तरह की हिंसक और दुरुपयोग वाली परिस्थितियों के शिकार होने वाले बच्चों और अभावग्रस्त महिलाओं से ही उनकी खुद की सलामती से जुड़े मसलों पर राय नहीं ली जाती. वे उनकी दया पर निर्भर होते हैं जिनके पास किसी न किसी तरह की ताकत होती हैचाहे वो सरकार होअधिकारी होंराजनेता हों या फिर बाकी सारा समाज हो. सरकारी संरक्षण में इन कमजोर समूहों के हालात में तब्दीली लाने के लिए ये बहुत जरूरी है कि वो पुरानी और पितृसत्तात्मक मानसिकता बदली जाए जिसमें अपने साथी मनुष्यों के साथ बार-बार हिंसा निर्मित करते हुए उन्हें सम्मान और गरिमा के लायक नहीं समझता जाता. इससे भी जरूरी ये है कि इन कमज़ोर समूहों को सशक्त करने की जरूरत है. इसके लिए उनसे संपूर्ण अधिकारों से युक्त नागरिकों जैसे बर्ताव होना चाहिए और उनके कल्याण और चिंताओं से जुड़े मसलों को संबोधित करते हुए उन्हें एक सक्रिय भूमिका निभाने देनी चाहिए.

 

इन बाल देखभाल संस्थानों और आश्रय गृहों की ऐसी भयानक स्थिति है कि इन नाबालिगों और अभावग्रस्त औरतों को उन्हीं के "संरक्षकों" से और अलग ही रूपों वाले दुर्व्यवहार व हिंसा से बचाने की जरूरत है. रक्षकों के भेष में इन संस्थानों को चला रहे अपराधियों को सामाजिक सुरक्षा वाली व्यवस्थाओं से चुन-चुनकर बाहर निकालने की जरूरत है. इसके बाद ही इन संस्थानों में नरक भोगने को मजबूर अनेक इंसानों के बुनियादी मानव अधिकारों और आत्म-मूल्य की भावना स्थापित की जा सकेगी.

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