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एक फिज़ूल दौड़ भगोड़ों के पीछे

भगोड़ा आर्थिक अपराध विधेयक एक व्यर्थ की भ्रष्टाचार विरोधी क्रिया है.

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी मामलों में झटके लगने के बाद पूरे देश में हंगामा मचा हुआ है. इसी बीच राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार 31 जुलाई 2018 को एक नया कानून लाई है - भगोड़ा आर्थिक अपराध विधेयक (एफईओए) 2018. सरकार इसे लाई है ताकि उन अपराधियों को वापस लाया जा सके जो भारतीय न्याय प्रक्रिया से बचने के लिए विदेशी सीमाओं में चले गए हैं और चुनावी वर्ष में अपनी इज्जत बचाई जा सके. हालांकि सरकार इस विधेयक की कारगरता को लेकर बड़े-बड़े शब्द इस्तेमाल कर रही है, खासकर इसका वो प्रस्ताव जिसमें बिना दोषसिद्धि के संपत्तियां ज़ब्त की जा सकेंगी क्योंकि इस प्रस्ताव की व्यवहार्यता स्पष्ट नहीं है.

ये विधेयक अपनी कारगरता में न सिर्फ प्रभावहीन है बल्कि इसे संवैधानिक रूप से भी चुनौती दी जा सकती है. खासकर वो प्रावधान जिसमें न्यायपालिका को ऐसी शक्तियां दी गई हैं जो उनके विवेक के अधीन होंगी ताकि एक आरोपी को सिविल कार्रवाही के दौरान किसी भी सिविल दावे में अपना बचाव करने के हक से वंचित किया जा सके. ये शक्तियां तो प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों पर ही खतरा हैं. इसमें भी सबसे चिंताजनक मसला ये है कि इस तरह के कानून के पीछे के जो बुनियादी सिद्धांत हैं वे ही त्रुटिपूर्ण हैं.

भारत में जो भगोड़ा आर्थिक अपराध होते हैं उन्हें लेकर पहले से ही ढेर सारे अधिनियम हैं. तो फिर एफईओए यहां पर कौन से कानूनी शून्य को भरने की कोशिश कर रहा है? कानूनी मामलों के विभाग के मुताबिक अभी जो आर्थिक अपराध कानून हैं (मसलन 'धन - शोधन निवारण अधिनियम, 2002) उनमें अपराध करने वाले को सजा मिलने के बाद ही उसकी संपत्ति जब्त की जा सकती है लेकिन जो आरोपी भारतीय न्याय व्यवस्था से भगोड़े हैं उनके लिए कोई रोकथाम नहीं है, और एफईओए इसी अंतर को पाटेगी. हालांकि अभी ये स्पष्ट नहीं है कि कैसे पाटेगी. एफईओए दरअसल एक पूर्वव्यापी नियमन है और इस वजह से ये मौजूदा आर्थिक घोटालों का कुछ नहीं कर सकता क्योंकि ये सब इस नए कानून के आने से पहले हो गए थे. मोदी और माल्या जैसे ताकतवर भगोड़ों के जितने बड़े बड़े राजनीतिक संपर्क हैं उन्हें देखकर तो इस बात में भी संदेह है कि भविष्य में भी सरकार कोई मामला सुलझा पाएगी. ये अनुमान करना भोलापन ही है कि अपराध से जुड़ी संपत्तियां आक्रामकता से जब्त करने मात्र से उन आरोपियों पर दबाव पड़ेगा और वो भारतीय कानून के सामने आत्म-समर्पण कर देंगे.

ये पहले भी हुआ है कि इस देश में कई सरकारों ने अपने असल पक्षपाती इरादों को छुपाने के लिए नए कानून बनाने का खेल खेला है. कानूनों का इस्तेमाल तो सरकारों द्वारा अपनी अच्छी नीयत के संकेतों के तौर पर किया जाता है, खास तौर पर उन गरीबों को लुभाने के लिए जो उनका प्रमुख वोट बैंक है. इसके समानांतर इन बड़े औद्योगिक घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसे कानूनों को लागू करते हुए नियमों को मरोड़ा जाता है क्योंकि ये घराने राजनीतिक दलों के प्रमुख दानदाता हैं. याद कीजिए कि ये विदेश मंत्रालय और सरकारी जांच एजेंसियों की मिली-भगत से ही हुआ कि नीरव मोदी को देश छोड़कर भागने से रोका नहीं गया जिसकी वजह से कानूनी प्रक्रियाएं विलंबित हो गईं. वहीं विजय माल्या के मामले में ये दिक्कत नहीं हुई कि अपराध से जुड़ी संपत्तियों को जब्त नहीं किया गया, यहां खेल ये हुआ कि जब जब्त संपत्तियों को नीलामी के लिए रखा गया तो कोई बोली लगाने वाले ही नहीं आए. एफईओए के पास ऐसे व्यवस्थागत गतिरोधों का सामना करने के कोई उपकरण नहीं हैं. देश में जितने भ्रष्टाचार विरोधी कानून हैं ये उन्हीं में एक नया जोड़ है जो इस बात से लोगों का ध्यान हटाने का प्रयास है कि ऐसी परिस्थितियों के निर्माण में सरकार की खुद की भूमिका रही है जो इन धांधलियों को रोकने में नाकाम रही हैं.

इन भगोड़ों ने जो बकाया राशियां नहीं चुकाई हैं वो सरकारी बैंकों द्वारा झेली जा रही गैर-निस्पंदकारी संपत्तियों यानी एनपीए की ही व्यापक समस्या का हिस्सा है. इस संकट में नीतिगत स्तर पर जो प्रतिक्रियाएं हैं वो सुस्त रही हैं. सबसे प्रमुख सरकारी बैंकों ने जो बुरे कर्जे जमा किए हैं उनका आकार भौचक्का कर देने वाला है और इन्हें किसी अल्प अवधि की स्थिति कहकर अब खारिज नहीं किया जा सकता है. इससे ये भी साफ दिखता है कि सरकारें कैसे वरिष्ठ अधिकारियों और बोर्ड सदस्यों की नियुक्ति या दक्षता को बढ़ावा देने के नाम पर पूंजी आवंटन की राशनिंग को प्रभावित करने में शेयरधारक के तौर पर अपने अधिकार का इस्तेमाल मनमाने तरीके से कर रही हैं. इसके अलावा ये कृत्य भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की विनियामक व्यवस्था पर अतिक्रमण करते हैं क्योंकि मौजूदा सरकार की तरफ झुके वरिष्ठ बैंक अधिकारियों की राजनीतिक नियुक्तियां की जा रही हैं जो कि आरबीआई के नियामक ढांचे का उल्लंघन है. 2019 के चुनाव आ रहे हैं और लोगों के पैसे का इतने बड़े स्तर पर कुप्रबंधन करने पर मौजूदा सरकार की कड़ी आलोचना हो रही है. सरकार एक के बाद एक, दो अधिनियम पास करके इस नीतिगत गतिरोध को ढकने की बहादुरी से कोशिश कर रही है. पहला अधिनियम, बैंकिंग विनियमन (संशोधन) अध्यादेश है जिसे मई 2018 में पारित किया गया था जिसका उद्देश्य था कि बैंकों के बकाया ऋणों की वसूली में तेजी लाई जा सके. उसके बाद जुलाई 2018 में दूसरा अधिनियम एफईओए लाया गया. इस देश की बैंकिंग व वित्तीय व्यवस्थाओं में ढांचागत बदलाव लाने को लेकर इन दोनों ही अधिनियमों में बहुत कम संबद्धता और प्रांसगिकता है.

इस मौजूदा वित्तीय भ्रष्टाचार को किसी एक सत्ताधारी सरकार के क्षणभर के इशारे से नहीं घटाया जा सकता है. मोटे तौर पर तो ये उदारीकरण के युग की नव-उदारवादी नीति की विरासत है. विनियमन और उदारीकरण के साथ ही सरकार ने निजी क्षेत्र के नेतृत्व वाले विकास को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में एक अलग भूमिका अख्त़ियार कर ली है. निजी कारोबारी घरानों को देश के सीमित संसाधनों में बेरोक-टोक पहुंच दे दी गई है और सरकारी नीतियों का लगातार निजी हितों के साथ मेल बैठाया जा रहा है. कई सबूत ये जाहिर करते हैं कि सरकार की इस तरह की कारोबार-हितैषी रणनीतियों ने भ्रष्टाचार को बढ़ा दिया है, क्योंकि बहुत सारे लोगों की कीमत पर, चंद लोगों के पक्ष में संपत्ति के सरकार द्वारा प्रायोजित पुनर्वितरण को उसने प्रोत्साहित किया है. इन सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक कड़ियों पर किसी भी तरह का ध्यान दिए बिना कोई भ्रष्टाचार-विरोधी रणनीति इस स्थानीय और गहराई में पैठ चुकी अव्यवस्था को रोक नहीं पाएगी.

अभी की हालत ये है कि भारत में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान मोटे तौर पर नैतिक गुस्से पर निर्भर होते हैं. मौजूदा सरकार के बिना सोचे-समझे ये अधिनियम भी इसी दृष्टिकोण में मिले लगते हैं. जहां ये नैतिकतावादी दृष्टिकोण भ्रष्टाचार को लेकर लोगों की जागरूकता को बढ़ा सकता है, वहीं ये उन बड़े उद्देश्यों को हासिल करने में असफल रहता है जो इन अभियानों को चलाने वालों ने शुरू में अपने लिए तय किए थे. यही वजह है कि ये अभियान अपने शुरुआती उन्माद को बरकरार नहीं रख पाते हैं.

 

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