ISSN (Print) - 0012-9976 | ISSN (Online) - 2349-8846

संपादक की मेज़ से

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The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) से उसके संपादक के तौर पर जुड़ना मेरे लिए वाकई में बड़े सम्मान की बात है. सौभाग्य है कि ये जुड़ाव ऐसे वक्त में हुआ है जब एक पत्रिका के रूप में इसकी प्रतिष्ठा पूरी तरह बरकरार है. यह विशेषतौर पर ईपीडब्ल्यू के साथियों के न्यायपूर्ण कठोर परिश्रम, प्रतिबद्धता और दायित्व की वजह से है और ईपीडब्ल्यू के पाठक समुदाय की वजह से भी जिन्होंने अपने प्यार से इस पत्रिका को समर्थन दिया है, जिस वजह से यह अपनी विशेष स्थिति बनाकर रख पाई है. ऐसे में ईपीडब्ल्यू के संपादक के रूप में औपचारिक रूप से जुड़ना अपने साथ एक बड़ी जिम्मेदारी लाता है, जो इस दायरे में स्वयं का निवेश करने की है. वो दायरा जो विविध और विरोधी विचारों को मंच देता है और उन्हें इकट्ठा भी करता है. ऐसे विचार जो विभिन्न आर्थिक बदलावों और राजनीतिक अभिव्यक्तियों के बीच एक जटिल रिश्ते के स्थानीय और वैश्विक संदर्भों को समझने में बहुत महत्वपूर्ण हैं. यह ईपीडब्ल्यू की अनोखी परंपरा रही है कि ऐसे विचारों को परखे और साथ लेकर आए जो लोगों की गहन सोच व परिवर्तनकारी प्रथाओं वाले अलग-अलग स्थानों से उसकी ओर आते हैं.
 
यह एक उचित अतिशयोक्ति ही होगी अगर मैं इस पत्रिका को एक खुले विश्वविद्यालय की तरह देखूं. ईपीडब्ल्यू अपना खास नजरिया किसी पर थोपती नहीं है बल्कि उन अलग-अलग दृष्टिकोणों का सम्मान करती है जो इस समान ज़रूरत पर एकत्रित होना चाहते हैं जिसमें हर एक जीवित प्राणी को एक बराबर मानवीय मूल्य प्रदान किया जाए. ईपीडब्ल्यू में जो धरातल हैं वो इसीलिए अपने सार में तर्कसंगत हैं और अपनी अभिव्यक्ति में आलोचनात्मक. इन धरातलों में ऐसी बहसों को जगह मिलती है जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के कई महत्वपूर्ण मसलों पर केंद्रित हैं. अर्थव्यवस्था और राजनीति का जो बदलता हुआ स्वभाव है उस संदर्भ में और विशेषतौर पर मौजूदा समय में ईपीडब्ल्यू की भूमिका अत्यंत महत्व की हो जाती है. राजनीति का जो समकालीन दायरा है वो इतना खोखला हो गया है जितना कि अभी की राजनीतिक अभिव्यक्ति है जो दावा तो करती है कि प्रभावशाली है लेकिन असल में नकली प्रतीत होती है. इसके अलावा जो विरोधी-राजनीतिक अभिव्यक्ति है वो खंडित हो चुकी है. अभी की जो प्रधान राजनीतिक अभिव्यक्ति है वो शब्द-बाहुल्यता से ही भरी नजर आती है और इस वजह से एक प्रमुख नेता के खोखले वादों को दोहराने में धाराप्रवाह होने की क्षमता अतिआवश्यक हो गई है ताकि वो एक भ्रम पैदा कर सके. प्रधान राजनीतिक शक्तियों के दो मकसद इससे पूरे होते हैं - एक तो औपचारिक राजनीतिक सत्ता में बने रहना और दूसरा, ऐसी ताकत का इस्तेमाल अपने सामाजिक दबदबे को बढ़ाने में करना.
 
उन लोगों की विरोधी अभिव्यक्तियां जो सत्तारूढ़ राजनीतिक अभिव्यक्ति के खिलाफ लड़ रहे हैं न सिर्फ आंतरिक रूप से खंडित हैं बल्कि बाहरी रूप से भी ट्विटर, ब्लॉग और वॉट्सएप आदि पर निरंतर दबाए जाने के खतरे का सामना कर रही हैं. सोचने पर जो ये समकालीन दबाव है इसमें राजनीतिक रूप से सही होने के लिए अपने को या परिवर्तनकारी स्वयं को तुरंत संतुष्ट करने की तीव्र इच्छा शामिल है. वहीं इस चक्र के दूसरी तरफ, खासकर जो प्रतिगामी स्वयं हैं, उनको किसी भी अहसास से उकसाहट उपलब्ध हो जाती है. हालांकि, दक्षिणपंथी राजनीति का प्रतिनिधित्व करने वाली ऐसी दबी हुई सोच के पास ज़हरीली और झूठी विषय-सामग्री है जो ब्लॉग्स और ट्विटर के माध्यम से प्रसारित की जाती है.
 
इस तरह की 'दो-मिनट मैगी' वाली सोच चाहती है कि परिवर्तनकारी सोच को हटाकर उसकी जगह त्वरित सोच को ले आए. गंभीर सोच के बजाय इस तरह का शॉर्टकट लेना एक बहुत गहरे संकट का स्त्रोत नहीं है बल्कि उसका लक्षण है. ऐसा लगता है कि इसने अपने जकड़े हुए तर्क में लोगों के स्वतंत्र होकर सोचने की आज़ादी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है. 'दक्षिणी ध्रुव' की तरफ रहने की लोगों की इच्छा और संभवतः सामाजिक रूप से बाध्यकारी ज़रूरत ऐसे 'प्रगतिशील स्वयमों' का निर्माण करती है जो राजनीतिक रूप से जागरूक होने के बजाय राजनीतिक रूप से सही होने की जरूरत से अधिक संचालित होते हैं. ये विडंबना की बात है कि राजनीतिक रूप से सही होने की ये ज़रूरत यहीं से वो ज़मीन बनाती है जिस पर खड़े होकर अपने विरोधियों के साथ 'खोखले शब्दों के खेल' या भाषाई खेल में हिस्सा लिया जा सके.
 
इसके अलावा परिवर्तनकारी सोच में जो संकट है, वो यहां आते-आते उस चीज में मिल जाता है जिसे भाषाई खेल के कर्मकांड कहा जा सकता है. मौजूदा समय में वो लोग जो हावी राजनीतिक अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं और वो लोग जो विरोधी-अभिव्यक्ति निर्मित करते हैं, ये दोनों ही ऐसे आदान-प्रदान में हिस्सा लेते हैं जो एक संवाद को महज एक औपचारिकता में तब्दील कर देता है. मसलन, जैसे मौजूदा सरकार अपनी नाकामी को छुपाने के लिए "राष्ट्र-विरोधी" और "छद्म-धर्मनिरपेक्ष" जैसे जुमलों का उपयोग करती है. लेकिन वो लोग जो विरोधी-राजनीतिक अभिव्यक्ति का निर्माण करते हैं, वो सरकार की थोक शब्दावली का खंडन करने के लिए खुद भी इसी तरह की थोक शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में इस शब्दावली को उलट देना ही सुधारवादी की आम प्रतिक्रिया बन जाती है.
 
ईपीडब्ल्यू एक खुली किताब है. ये कोई चंद सुधारवादियों का संभ्रांत अंतःक्षेत्र नहीं है जो कई संघर्षरत समूहों के लिए आवाज उठाने के एक जैसे उद्देश्य की वजह से एक साथ आते हैं ताकि अपनी राजनीतिक त्रुटिहीनता साबित कर सकें. इसे थोड़ा अलग से कहें तो बौद्धिक अभिजात गलियारों, अध्येताओं के समूहों, कार्यकर्ताओं और समाज सेवकों जैसे जितने भी एक जैसी पहचान वाले समूह हैं वे उन लोगों का प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं जो एक-दूसरे से सहमत हों और एक-दूसरे के लिए ऐसी भाषा में लिखते हों जो उनको बहुत शानदार लगती हो, और ऐसी लेखनी की विषय-वस्तु को बहुत आदर्श माना जाता हो. सुधारवादियों के गलियारों के बीच जो अभिव्यक्ति होती है उसे सार रूप में समझाना हो तो ये आमतौर पर सुना जाने वाला जुमला सटीक बैठता है कि - "जैसा कि हम सब जानते हैं." ऐसे मामलों में उद्धार की राजनीति फिर जनता की परियोजना नहीं रह जाती.
 
किसी निजी ब्लॉग के उलट और एक खुली किताब के तौर पर ईपीडब्ल्यू का मानना है कि महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टियां तो विभिन्न दृष्टिकोणों में से उभर सकती हैं, बस निर्भर इस पर करता है कि उन लोगों का धरातल क्या है जहां खड़े होकर वे इन दृष्टिकोणों को अपनाए हुए हैं. ईपीडब्ल्यू का ये भी मानना है कि महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टियों का कोई तय पता नहीं होता, और वो उद्धार से जुड़े सभी संघर्षों वाले स्थलों से हमारी तरफ आती हैं. निश्चित तौर पर यह पत्रिका उस विशिष्ट स्थिति में है जो विचारों की महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी ताकत का लोकतंत्रीकरण कर सकती है. यह इस पत्रिका की विषय-वस्तु से भी स्पष्ट होता है और उस समतामूलक इरादे से भी जाहिर होता है जो विभिन्न समूहों के बीच सेतुओं का निर्माण करके गंभीर सोच का लोकतंत्रीकरण करना चाहता है. ईपीडब्ल्यू का डिजिटल संस्करण और उसकी अनुवाद परियोजना, परिवर्तनकारी विचारों को एकजुट करने और उन्हें मंच प्रदान करने के लिहाज से एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. 
 
 
मैं हर किसी ने विनम्र अनुरोध करता हूं कि मानव उद्धार को एक सार्वजनिक परियोजना बनाने की ईपीडब्ल्यू की इस कोशिश में हिस्सा लें.
 
 
गोपाल गुरु, मुंबई

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