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क्यों यह प्रतिशोध?

सरकार विदेशी निवेशकों का हर तरह से साथ दे रही है और मारुति सुजूकी के मजदूर मुश्किल में हैं

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18 जुलाई को गुरुग्राम में मारुति सुजूकी कंपनी में काम करने वाले हजारों मजदूरों ने विरोध-प्रदर्शन किया. कुछ साल पुराने हत्या के एक मामले में फंसाकर मारुति के 13 पूर्व कर्मचारियों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई. इसमें 12 मारुति मजदूर संघ से जुड़े थे. 18 जुलाई का प्रदर्शन इसके खिलाफ ही था. हम इसलिए फंसाया हुआ कह रहे हैं क्योंकि पुलिस ने कंपनी से मिलकर साक्ष्यों से छेड़छाड़ की. मामले की सुनवाई कर रहे अतिरिक्त जिला जज आरपी गोयल ने 148 मजदूरों में 117 को बरी कर दिया. ये सभी आरोपी कंपनी द्वारा दी गई सूची के आधार पर नामजद किए गए थे. न कि इनका नाम किसी जांच के आधार पर शामिल किया गया था. जज गोयल ने उन मजदूरों की स्वीकारोक्ति नहीं ली जो आरोपी नहीं थे और उस वक्त कंपनी परिसर में मौजूद थे जब कथित तौर पर उस अपराध को अंजाम दिया गया.
 
इस साल 18 जुलाई का अवनीश देव के निधन का छह साल पूरा हुआ. वे एक ऐसे प्रबंधक थे जो मजदूरों के यूनियन के संघर्ष को लेकर संवेदनशील थे. 2012 में कंपनी के उकसावे पर पैदा हुई उस स्थिति में रहस्यमय ढंग से आग लगी और सिर्फ एक व्यक्ति की ही जान गई थी और वे देव थे. कंपनी प्रबंधन और हरियाणा सरकार ने मजदूरों के खिलाफ प्रतिशोध के भाव से लगातार काम किया. इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं होती कि भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकार ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में अर्जी देकर उम्र कैद को फांसी की सजा में बदलने की मांग की है. आखिर भाजपा सरकार पहले की कांग्रेस की सरकार की तरह मजदूरों को इस तरह की सजा क्यों दिलाना चाहती है?
 
जब सत्र न्यायालय में विशेष अभियोजक अनुराग हुड्डा से यह पूछा गया कि वे 13 मजदूरों को मौत की सजा देने की मांग क्यों कर रहे हैं तो उन्होंने कहा, ‘हमारा औद्योगिक विकास गिर गया है. एफडीआई नहीं आ रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मेक इन इंडिया की बात कर रहे हैं लेकिन ऐसी घटनाएं हमारे देश पर धब्बा हैं.’ इसका मतलब यह हुआ कि मजदूरों को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग का भी हक नहीं है. औद्योगिक विकास और एफडीआई को प्रोत्साहित करने के लिए औद्योगिक प्रतिष्ठानों को कुछ भी करने का लाइसेंस मिल जाता है? मारुति के मजदूरों के सामने अपने संगठन को पंजीकृत कराने के लिए दो साल के संघर्ष के अलावा कोई और रास्ता नहीं था. उस घटना के पांच महीने पहले यानी जनवरी, 2018 में ही इस संगठन को मान्यता मिली थी.
 
कंपनी नियमित मजदूरों की जगह ठेका मजदूरों से काम कराना चाहती थी. कंपनी का यही हक दांव पर लगा था. क्योंकि ठेका मजदूरों को कम पैसे में बुरी कामकाजी परिस्थितियों में काम करना पड़ता था. कंपनी को इस काम में भाजपा, कांग्रेस और पूरी सरकारी मशीनरी का साथ मिल रहा था. उस समय की कांग्रेस पार्टी की सरकार ने और भाजपा ने पुलिस की मदद से मारुति के मजदूरों को फंसाने का षडयंत्र किया. ऐसा करके वे देश भर के मजदूरों को यह संदेश देना चाहते थे कि अगर इस तरह की मांग उठाई तो ऐसा ही हश्र होगा. भाजपा को मोदी के मेक इन इंडिया की वजह से इसमें ज्यादा साथ देना पड़ रहा है. क्योंकि विदेशी निवेशकों को भरोसा दिलाने का इससे अच्छा तरीका क्या हो सकता है!
 
कंपनी ने उस घटना के बाद 2,300 मजदूरों को बगैर किसी जांच के निकाल दिया था. उन्हें अपनी बात रखने का मौका तक नहीं दिया गया. हालांकि, अब हरियाणा सरकार 117 मजदूरों को बरी किए जाने के खिलाफ भी अपील कर रही है.
जिन 13 मजदूरों को सरकार फांसी दिलाना चाहती है, उनका मुकदमा वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर, रेबेका जाॅन और आरएस चीमा लड़ेंगे. ऐसे में अभियोजन पक्ष के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर यह साबित करना मुश्किल हो जाएगा कि इन मजदूरों ने आग लगाई और उस आग में फंसकर दम घुंटने से देव की मौत हो गई.

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