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फिलीस्तीन को बंद करना

इजरायल का भेदभावपूर्ण राष्ट्रीयता कानून बनाना यह दिखाता है कि कैसे पूरी दुनिया में राष्ट्रवाद की भाषा बढ़ रही है

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इजरायल ने एक भेदभावपूर्ण कानून बनाकर यह घोषित कर दिया है कि इजरायल यहूदी लोगों का राष्ट्र है. इसका लक्ष्य फिलीस्तीनी लोगों को बाहर का रास्ता दिखाना है. स्थापित सरकार को इससे आलोचनाएं मिलनी चाहिए लेकिन कई सरकारों ने अनदेखी का रुख अपनाया है. ऐसा इसलिए क्यों रणनीतिक हित न्याय की रक्षा से अधिक अहम हो गए हैं. दुनिया में यह भाव पैदा हो गया कि दुनिया की अकेली महाशक्ति के साथ से इजरायल आज इस स्थिति में है कि उसे युद्ध के मैदान में नहीं हराया जा सकता. न ही इसे नैतिकता के मामले में चुनौती दी जा सकती है क्योंकि इसे कभी इसकी कद्र ही नहीं रही.
 
अभी की स्थिति में वैश्विक अनदेखी की गहरी वजह हो सकती है. नस्लीय विशेषाधिकारों के लिए पुराने मूल्यों को छोड़ा जा रहा है. आत्मज्ञान के दौर में यह बात आई थी कि गैरबराबरी के आधार पर पैदा हुई किसी समस्या का समाधान गणतांत्रिक मूल्यों से किया जा सकता है.
19 जुलाई को इजरायल के इजरायल के नए कानून बनाने का यहूदी दायरों में स्वागत किया गया है. वहीं कुछ लोगों ने इसकी आलोचना भी की है और इसे इजरायल के स्थापना के वक्त के मूल्यों के विपरीत बताया है.
 
इजरायल के मशहूर संगीतकार डेनियल बारेनबोइम ने इस कानून को इजरायल के स्वतंत्रता घोषणापत्र के उलट बताया है. 1948 के उस घोषणापत्र में सभी के लिए समानता और पड़ोसी देशों और इन देशों के लोगों से सौहार्दपूर्ण संबंध की बात कही गई थी. इससे लगता है कि उस वादे के साथ धोखा हुआ है. हालांकि, ऐसा पहले भी किया गया है. अमेरिका और फ्रांस में भी अधिकारों से संबंधित घोषणापत्र के उलट रुख अपनाया गया और दासता, नस्लवाद, उपनिवेशवाद के खिलाफ बने माहौल के विपरीत रास्ता अपनाया गया. इजरायल ने शुरुआत से ही इस तरह का रुख अपना रखा है. इसे साम्राज्यवादी ताकत का साथ भी मिला है. जब इजरायल ने फिलीस्तीन पर नजर डालने की शुरुआत की तो यह नारा दिया गया कि जनता के बिना जमीन उस जनता के लिए है जिसके पास जमीन नहीं है. नस्लीय भेदभाव के आधार पर लोगों पर अत्याचार हुए. 1967 में सैन्य कामयाबी के जश्न में बहुत बातें भुला दी गईं. संघर्ष लोकतांत्रिक मूल्यों और यहूदी विशेषाधिकार का था. आज इजरायल में जो लोग हैं उनमें यहूदी अल्पसंख्यक हैं.
 
इजरायल ने सालों तक खुले तौर पर नस्लभेदी हिंसा की. इजरायल के नए कानून का विरोध इसलिए भी नहीं हो रहा क्योंकि इसका सबसे बड़ा सहयोगी अमेरिका खुद इसी तरह के मूल्यों को महत्व देता दिख रहा है. इसके तहत लोकतंत्र एक अधिकार नहीं बल्कि विशेषाधिकार है.
जब इजरायल बना था तो वहां भयंकर अराजकता थी. पश्चिमी पूंजीवाद ने कल्याणकारी राज्य की भाषा इस्तेमाल करके खुद को मजबूत किया. 1980 के दशक तक कल्याणकारी राज्य और विकास दोनों की विचारधारा संकट में थी. हर किसी को जाति, नस्ल, लिंग और धर्म को परे रखते हुए बराबरी से देखने का वादा किया गया. हालांकि, देशों के बीच बढ़ती गैरबराबरी को देखते हुए इसे बनाए रखना आसान नहीं था.
 
सबआल्ट्रन असंतोष की वजह से असुरक्षा बढ़ी और विशेषाधिकारों की मांग भी. लेकिन समृद्धि के सालों में भी निश्चित चीजें ही ठीक हुईं लेकिन नस्लीय भेदभाव बनी रही. नई राष्ट्रवादी भाषा उभरी और नस्लीय तस्वीर भी पूरी दुनिया में उभरी. इजरायल को खुद को यहूदियों का राष्ट्र घोषित करने के लिए अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप के आने का इंतजार करना पड़ा. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने यह स्पष्ट किया है कि फिलीस्तीनी जमीन पर दावा भविष्य में भी बरकरार रहेगा. फिलीस्तीन के आंदोलन को हमेशा से दो राष्ट्र वाले समझौते का भरोसा रहा. लेकिन जिस तरह से इजरायल मौत और विनाश को बढ़ावा दे रहा है उसमें कई चीजों को परीक्षा से गुजरना है. आशंका इस बात की भी है कि कोई ऐसी बुरी स्थिति पैदा हो जिसकी लपटों का दायरा पूरी दुनिया में पहुंचे.

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