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छोटे किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन

मोदी सरकार द्वारा खरीफ फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की घोषणा दिखावे से अधिक कुछ नहीं है

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भारत में कृषि न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी का चुनाव जीतने के लिए इस्तेमाल होता रहा है. मौजूदा सरकार की हालिया घोषणा इससे अलग नहीं है. इसी सरकार ने सत्ता में आने के बाद लागत से डेढ़ गुना पर एमएसपी तय करने से इनकार किया था. लेकिन अगले लोकसभा चुनावों को देखते हुए इसी सरकार ने यह निर्णय लिया और इसे ‘ऐतिहासिक’ बताया.
 
हालांकि, इसमें ऐतिहासिक कुछ नहीं है. पिछली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कार्यकाल के दौरान एमएसपी की औसत वृद्धि इस सरकार में कम रही है. रागी का एमएसपी इसका अपवाद है. हालांकि, इस घोषणा के पहले भी कई अनाजों की खरीद इस फाॅर्मूले पर हो रही थी.
सबसे बुरा पक्ष इन घोषणाओं का क्रियान्वयन है. खास तौर पर छोटे और सीमांत किसानों के लिए. 2017-18 में कई अनाजों का बाजार भाव एमएसपी से भी नीचे चला गया. महाराष्ट्र में अरहर का बाजार भाव एमएसपी से 20-25 फीसदी कम था. मध्य प्रदेश में सोयाबीन और उड़द का बाजार भाव क्रमशः 15 और 52 फीसदी कम रहा.
 
बाजार भाव और एमएसपी के बीच बढ़ता अंतर यह दिखाता है कि उत्पादन और विपणन संबंधित नीतियों के बीच खाई है. एमएसपी का आकलन पारंपरिक तौर पर लागत के आधार पर किया जाता है. मांग की अनदेखी की जाती है. बाजार भाव से अधिक एमएसपी होने से काफी अधिक उत्पादन होगा. लेकिन अगर मांग ही नहीं होगी तो कीमतें बाजार में एमएसपी के नीचे जाएंगी.
 
भारत में एमएसपी का क्रियान्वयन सरकारी खरीद के जरिए होता है. हालांकि, इसका दायरा बेहद सीमित है. धान और कपास को छोड़कर बाकी फसलों की खरीद की स्थिति बेहद खराब है. दलहन और तिलहन में 60 फीसदी उत्पादों की खरीद 10 फीसदी से भी कम होती है. ऐसे में इस मोर्चे पर सुधार किए बगैर एमएसपी बढ़ाने से कुछ नहीं होगा.
 
कृषि उत्पादों की कीमतों में उतार-चढ़ाव का अंदाज सिर्फ उत्पादन के आधार पर नहीं होगा. कीमतों का निर्धारण काफी हद तक फसल लगने के बाद होता है. उपज के बाद का तंत्र गड़बड़ है. इसमें काफी बिचैलिये हैं. जानबूझकर संकट पैदा किया जाता है. किसानों को कम पैसे मिलते हैं और उपभोक्ता को अधिक पैसे खर्च करने होते हैं. चावल में कारोबारियों का मुनाफा 80 फीसदी तक है. ऐसे में समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी होने से वे भी अपना मुनाफा बढ़ाने में लग जाते हैं.
 
एमएसपी का फायदा किसानों या गैर-किसानों को होगा या नहीं, यह मांग और आपूर्ति पर निर्भर करेगा. आम तौर पर भारत में किसान पैदावार के तुरंत बाद बेचने को मजबूर रहते हैं. इस मजबूरी का फायदा कारोबारी उठाते हैं. समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी से कीमतों में आने वाले उतार-चढ़ाव से किसानों को भारी नुकसान हो सकता है. इसका सबसे अधिक नुकसान छोटे और सीमांत किसानों को होगा जो खेत में ही अनाज बेचते हैं और जिन तक एमएसपी का तंत्र पहुंचा नहीं है. जब तक इन हस्तक्षेपों से विपणन संबंधित बुनियादी ढांचा नहीं खड़ा किया जाएगा, प्रसंस्करण को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा और एपीएमसी कनून में संघोधन नहीं किया जाएगा तब तक सिर्फ एमएसपी बढ़ाने से संकट झेल रहे किसानों का कुछ नहीं होने वाला.

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