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मुद्दे से अलग

हिंसक भीड़ पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय इसे प्रोत्साहित करने वाले मुद्दों की अनदेखी करता है

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17 जुलाई को उच्चतम न्यायालय ने तहसीन एस पूनावाला बनाम भारत सरकार के मामले में निर्णय देते हुए हिंसक भीड़ के हमलों को रोकने को कहा. इसने बीफ, हिंदू, मुस्लिम, दलित और सवर्ण जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी नहीं करने को कहा. इस निर्णय से किसी को यह लग सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय इसे रोकने को लेकर चिंतित है.
 
भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के इस निर्णय में समस्या का मूल नहीं दिखता है. मूल यह है कि भीड़ के हिंसक हमले अचानक नहीं होते या ये दूसरे कानून व्यवस्था के मसले जैसे नहीं हैं. प्राथमिक तौर पर ये सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने का औजार है. इससे उत्पीड़ित वर्ग के लोगों को यह संकेत देने की कोशिश होती है कि अगर उन्होंने बदलाव की कोशिश की तो इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ेगी. 
 
इस तरह के हमलों पर देश-दुनिया में जो साहित्य है, उसका कोई जिक्र इस निर्णय में नहीं है. पहले जो भी ऐसी घटनाएं हुई हैं, उनका भी जिक्र नहीं है. समस्या की वजहों का जिक्र भी इसमें नहीं है. इस समस्या की एक वजह यह है कि पुलिस अपना काम नहीं कर रही. अगर पुलिस ठीक से काम करना शुरू कर दे तो काफी चीजें ठीक हो जाएंगी. 
सुधार के दो तरीके हैं. बीफ को लेकर मुस्लिमों और दलितों के खिलाफ हिंसा भारतीय जनता पार्टी के चुनावी जीत के बाद से बढ़ गई हैं. जिन राज्यों में यह सत्ता में नहीं है, उन राज्यों के हमलावर भी संघ परिवार से संबंध रखने वाले हैं. भाजपा ने यह संदेश समाज में दिया है कि बीफ उद्योग से मुस्लिमों को आर्थिक लाभ हो रहा है.
 
इस समस्या की राजनीतिक प्रकृति को समझे बगैर सुप्रीम कोर्ट ने इसे सुलझाने का मौका गंवा दिया है. कैसे किसी हमलावर को डर लगेगा अगर कोई केंद्रीय मंत्री इन हमलों के कसूरवारों को सार्वजनिक तौर पर माला पहनाए. झारखंड में यही हुआ. सुप्रीम कोर्ट की पवित्रता वाली बातों का क्या मतलब है जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बड़े पैमाने पर चल रहे पुलिस मुठभेड़ों को अपनी सरकार की कामयाबी कहें?
 
दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा शासित राज्यों में बीफ को प्रतिबंधित करने वाले कानूनों को चुनौति देने वाली याचिकाओं की सुनवाई नहीं की है. यह 2016 से लंबित है. खाने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट ने पुट्टास्वामी मामले में स्वीकार किया है. इसके बावजूद उन मामलों पर कुछ नहीं किया जा रहा है जो दलितों और मुस्लिमों की जिंदगी मुश्किल में डाल रहे हों.
बगैर किसी आंकड़े पर ध्यान दिए उच्चतम न्यायालय ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कानून के प्रावधानों को कमजोर कर दिया. जबकि इसी सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात को गौवध निषेध कानून को सही ठहराया था यह कहते हुए कि दुधारु गायों ज्यादा महत्वपूर्ण उनके मुकाबले जिनकी रोजी-रोटी इस पाबंदी की वजह से प्रभावित हो रही है.
 
इसलिए पूनावाला मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को संदेह की नजर से देखा जाना चाहिए. क्योंकि ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट कुछ करते हुए दिखना तो चाहती है लेकिन कुछ करना नहीं चाहती. न तो अदालत ने इस मसले को ठीक से समझा और न ही सही समाधान दिया. जब तक उच्चतम न्यायालय निष्ठा और कुशलता से काम नहीं करेगा तब तक इसकी विश्वसनीयता में सुधार होना मुश्किल है.

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