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वरदान या अभिशाप?

इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सरकार और सिविल सोसाइटी के सामने बड़ी चुनौतियां पेश कर रहे हैं
 

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हाल ही में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को उन्हीं की भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों ने ट्विटर पर ट्रोल किया. इससे पता चलता है कि ऐसे मामलों से निपटने के विषय पर कैसे सरकार और सिविल सोसाइटी में भ्रम की स्थिति है. इस घटना पर स्वराज की पार्टी ने सधी हुई प्रतिक्रिया दी.
 
सूचनाओं और विचारों के प्रसार के लिए कोई माध्यम चाहिए. इंटरनेट फेसबुक, इंस्टाग्राम और वाॅट्सएैप जैसे प्लेटफाॅर्म उपलब्ध कराता है. लेकिन हमारे सामने चुनौती यह है कि सही सामग्री का प्रसार कैसे हो और गलत सूचनाओं का प्रसार कैसे रोका जाए. क्या माध्यम को प्रतिबंधित किया जाए या फिर प्लेटफाॅर्म को?
 
सामग्री को प्रतिबंधित करना या उसका सेंसर करने से संबंधित नियम बनाना बहुत आसान है लेकिन उसे लागू करना उतना ही मुश्किल. स्टालिन के दौर में रूस में सूचनाओं के प्रसार पर कठोर सरकारी नियंत्रण के बावजूद विद्रोहियों की कविताओं और रचनाओं का प्रसार हो ही जाता था. दक्षिण अफ्रीका में नस्लभेद के दौर में नेल्सन मंडेला की डायरी के पन्ने टाॅयलेट पेपर पर लिखकर प्रसारित किए जाते थे. आपातकाल के दौर में भारत में अखबारों ने पन्ने खाली छोड़े. लोग सूचनाओं के प्रसार का रास्ता तलाश ही लेते हैं. मोबाइल इंटरनेट के जमाने में नियंत्रण की बहस नए सिरे से चल पड़ी है. इसमें हर पाठक रिपोर्टर भी है, संपादक भी और राय बनाने वाला भी. ऐसे में अरबों लोगों को कैसे नियंत्रित किया जाएगा?
आज इन प्लेटफाॅर्म तक लोगों की पहुंच बेहद आसान हो गई है. ऐसे में लोगों की टिप्पणी को रोकना सरकारों के लिए असंभव हो गया है. सभी सामग्री की सेंसरशिप के लिए सरकारों को अलगोरिदम का इस्तेमाल करना होगा. जो खुद अभी अपने शुरुआती दिनों में है. इसके जरिए नियंत्रण में सक्षम तकनीक बनाने में कम से कम एक दशक लगेगा. इसके बावजूद इनक्रिप्टेड संदेशों को कैसे नियंत्रित किया जाएगा, यह सवाल अभी अनुत्तरित है.
 
सरकारों के लिए माध्यम को प्रतिबंधित करना आजकल आसान है. पिछले कुछ सालों में कई सरकारों ने कई बार इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं को बंद  करने का काम किया है. ईमेल, ईकाॅमर्स, आधार, यूपीआई, भीम आदि सभी चीजों के लिए इंटरनेट सेवाओं की जरूरत है. बड़ी कंपनियों ने इन सेवाओं को मुहैया कराने में अरबों का निवेश किया है. तो ऐसे में सरकारों की पाबंदियां कितनी जायज हैं? इंडियन काउंसिल फाॅर रिसर्च आॅन इंटरनैशनल इकाॅनोमिक रिलेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक इंटरनेट बंद होने की वजह से भारत को 2012 से 2017 के दौरान 20,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. सरकार जब चाहे तब इंटरनेट चला और बंद नहीं कर सकती. क्योंकि कानून का ठीक से पालन नहीं करने या कुछ लोगों का व्यवहार बदलने में नाकाम रहने का मतलब यह नहीं है कि नागरिकों का मौलिक अधिकार ले लिया जाए.
 
दूसरा उपाय है प्लेटफाॅर्म को बंद करना. लेकिन फेसबुक को भारत में कैसे बंद किया जा सकता है जब इसका इस्तेमाल सभी राजनीतिक दल, कार्यकारिणी, न्यायपालिका और करोड़ों आम लोग कर रहे हैं. जब आधिकारिक नीतियां ही वाट्सएैप ग्रुप में घोषित की जा रही हों तो फिर इसे प्रतिबंधित कैसे किया जा सकता है. अगर आपको चीन की तरह छवि की परवाह नहीं है तो पश्चिमी प्लेटफाॅर्म को बंद करके अपने प्लेटफाॅर्म खड़ा करें जिन्हें नियंत्रित करना आसान है. लेकिन भारत सरकार इस बात को लेकर चिंतित रहती है कि पश्चिमी देश उसे कैसे देखते हैं. इसलिए वह उदार दिखती है लेकिन है नहीं.
 
यही भारत सरकार के उलझन की असल वजह है. समझने की जरूरत यह है कि जब आप जहरीली विचारों को प्रोत्साहित करेंगे तो इसका प्रसार होगा. आजकल इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए हो रहा है. ऐसे में माध्यम को रोकने से समस्या का समाधान नहीं होगा क्योंकि समस्या के जड़ में नफरत और बंटवारे की राजनीति है.

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