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मुठभेड़ की आड़ में नरसंहार

गढ़चिरोली में ‘माओवादियों’ की नृशंस हत्या और ‘विकास’ पर

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

22 अप्रैल की सुबह महाराष्ट्र के गढ़चिरोली जिले के भामरागढ़ तहसील के बोरिया और कासनसुर गांव के बीच माओवादियों का एक समूह कैंप कर रहा था. कुछ नाश्ता कर रहे थे तो कुछ आराम. उनकी मौजूदगी की भनक पाकर हथियारों से लैस केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल का एक बड़ा समूह और सी-60 कमांडो ने धावा बोल दिया और माओवादियों को घेरकर उन्हें मार दिया. पुलिस का दावा है कि उसने 16 माओवादियों को मारा. पुलिस कुछ चुने हुए पत्रकारों को वहां ले गई और इन पत्रकारों ने आधिकारिक वर्जन अपनी खबरों के जरिए सामने रखा. अगले दिन पुलिस ने दावा कि उसने छह और माओवादियों को मार गिराया है. 24 अप्रैल को पुलिस ने यह कहा कि इंद्रावती नदी से उसे 15 लाशें मिली हैं और ये 22 अप्रैल के मुठभेड़ में मारे गए माओवादियों के हैं. इसका मतलब यह हुआ कि दो मुठभेड़ों में कुल 40 माओवादी मारे गए. इसके बाद एनकाउंटर स्पेशलिस्ट को पुरस्कार और प्रमोशन मिलना तय है और इसका जश्न भी!

 

अलगाववाद के खिलाफ लड़ाई में लड़ाकों और गैर-लड़ाकों के अंतर को जानबूझकर मिटा दिया जाता है. माओवादियों का कहना है कि जो मारे गए हैं, उनमें से 22 ही उनके कैडर से थे. बाद में जब कुछ अभिभावकों ने गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई तो पता चला कि 21 अप्रैल की रात आठ पुरुषों और महिलाओं का एक समूह गटेपल्ली से कासनसुर एक शादी में हिस्सा लेने जा रहा था. पुलिस ने इन लोगों को भी उठाकर मौत के घाट उतार दिया. यह माना जा रहा है कि इनकी लाशों को भी माओवादियों की लाशों के साथ एक जगह करके इन्हें मुठभेड़ में मरा दिखा दिया गया. एक मृतक माओवादी नेता के पिता ने अपने बेटे के शरीर पर कुल्हाड़ी से वार का निशान पाया. इससे पता चलता है कि कितने निर्मम ढंग से कार्रवाई हुई. लेकिन सत्ताधारियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

 

सत्ताधारियों को तो सिर्फ इस बात से मतलब है कि खनन परियोजनाओं के जरिए बड़े कारोबारी पैसे कमाएं और इसका एक हिस्सा उन नेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों तक पहुंचे जो कारोबारियों को कब्जा जमाने में मदद करते हैं. मादिया गोंड और दूसरे आदिवासी समूह खनन नहीं चाहते. उन्हें लगता है कि इससे उनके पहाड़, जंगल और नदियों पर बुरा असर पड़ेगा और पूंजीवादी संस्कृति आ जाएगी. वे लघु उद्यम चाहते हैं जो लघु वन उत्पादों पर आधारित हो और जिसका प्रबंधन ग्राम सभा करे. वे चाहते हैं कि 2006 का वन अधिकार कानून और 1996 का पेसा कानून ठीक से लागू हो. अगर जंगल की जमीन का किसी और परियोजना में इस्तेमाल होना है तो सरकार को ग्राम सभा की सहमति जरूर लेनी चाहिए. लेकिन जब ये लोग सामूहिक तौर पर इन अधिकारों की मांग करते हैं तो उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाकर उन्हें सरकारी दमन का शिकार बनाया जाता है. जब वे इस दमन के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो उन्हें माओवादी कहा जाता है और सरकार खनन परियोजनाओं की हितों की रक्षा के लिए सैन्यीकरण का सहारा लेती है.

 

गढ़चिरोली में खनन परियोजनाओं के खिलाफ आवाज उठनी 2007 में उस वक्त शुरू हुई जब लाॅयड मेटल को यहां खनन का ठेका मिला. इसके बाद कई दूसरी कंपनियां आईं. पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति ने गोपानी आयरन ऐंड पावर को ठेका देने की सिफारिश साल भर पहले की है. मादिया गांड द्वारा पवित्र माने जाने वाले सूरजगढ़ हिल को भी नहीं छोड़ा जा रहा है. ये लोग मानते हैं कि यहां इनके अराध्य ठाकुरदेव रहते हैं. स्वतंत्रता सेनानी बाबूराव शेडमके ने भी 1857 के संघर्ष में अपना केंद्र यहीं बनाया था. आदिवासी लोग इन खनन परियोजनाओं को अपने रहने की जगह पर एक लाल घाव मानते हैं और यह मानते हैं कि इससे सांस्कृतिक और पर्यावरणीय नुकसान होगा. खान-पान और पानी की दिक्कत होगी और जीवनयापन करना मुश्किल हो जाएगा.

 

लेकिन सत्ताधारियों को इसकी परवाह नहीं है. गृह मंत्रालय का ‘वामपंथी उग्रवाद विभाग’ का दावा है कि माओवादी निर्दोष और स्थानीय आदिवासियों को लोभ देकर और गलत जानकारी देकर बरगला रहे हैं और उन्हें अपने साथ जोड़ रहे हैं. पुलिस बलों के आधुनिकीकरण के लिए जो योजना बनी है, उसमें मीडिया के लिए भी एक योजना है. इसमें कहा गया है, ‘माओवादियों के प्रभाव की वजह से इनके प्रभाव वाले क्षेत्रों में दशकों से विकास नहीं हो पा रहा है.’ इसका मतलब यह हुआ कि विकास के नाम विनाश के जख्म दिए जाते रहेंगे.

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