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ऐतिहासिक भूल के 70 साल

अपने जन्म से लेकर अब तक इजरायल ने लगातार फिलीस्तीन और अपने पड़ोसियों के खिलाफ युद्ध बरकरार रखा है

 

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इजरायल के 70 साल होने को हैं. युद्ध के साथ ही इसका जन्म हुआ था और यह साथ अब तक बरकरार है. अरब जगत में कई तरह के गठजोड़ों से युद्ध लगातार चल रहा है और इसकी आंच ईरान तक पहुंच गई है. सीरिया में भी युद्ध जारी है. मई की शुरुआत में इसमें और तेजी आई और जल्द ही स्थिति विस्फोटक हो सकती है.

 

8 मई को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इसकी हरी झंडी दी. इजरायल लंबे समय से जो मांग करता आया है, उसे पूरा करने की दिशा में बढ़ते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ईरान के साथ हुआ परमाणु समझौता रद्द करेगा. इस समझौते के जरिए ईरान के आणविक कार्यक्रमों पर कई तरह की रोक लगी है.

 

इस समझौते पर दस्तखत जुलाई, 2015 में किए गए थे. अमेरिका और पांच देशों ने ईरान के साथ कई दौर की वार्ता के बाद यह समझौता किया था. विश्लेषकों ने इसे उपयोगी समझौता बताया था. समझौते के कुछ शर्तों की मामूली अवहेलना से इजरायल को अपने अस्तित्व पर खतरा लगने लगा है.

 

इजरायल को पूरी मानवता से युद्ध लड़ने की खुली छूट दे दी गई है. ट्रंप ने यह घोषणा की है कि अमेरिका इजरायल के अपने दूतावास को जेरूसलम ले जाएगा. इसके लिए 14 मई का दिन चुना गया. यह इजरायल का स्थापना दिवस है. फिलीस्तीन में इसे विनाश का दिवस माना जाता है. फिलीस्तीन में मार्च से ही विरोध का माहौल बना है. इजरायल द्वारा कब्जा जमाए गए जमीन की सीमा पर प्रदर्शन भी हुए.

गाजा की दो-तिहाई आबादी शरणार्थी है. इनमें से कई तो ऐसे हैं जो इजरायली हमलों के बीच कई बार बेघर हुए हैं. फिलीस्तीन के लोगों द्वारा सीमा पर प्रदर्शन करना उनकी अपने देश की कब्जा की हुई जमीन वापस लेने की मांग को दिखाता है. छह हफ्ते के इस विरोध प्रदर्शन में गाजा के 51 लोगों की जान इजरायली हमलों की वजह से हुई है. हयूमन राइट वाॅच ने इसे गैरकानूनी बताया है और इसकी जांच अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय को सौंपे जाने की बात कही है.

 

गाजा में की जा रही हत्याओं और सीरिया में हो रहे हमलों के बीच अमेरिका ने कहा है कि इजरायल को अपनी रक्षा का पूरा अधिकार है. अब जब इजरायल को 70 साल होने को हैं तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके मान्यता हासिल करने के तंत्र को समझना होगा. उस देश की प्रकृति क्या होगी जो निहत्थे प्रदर्शनकारियों को मार देता है और अपने पड़ोसी देशों पर आत्मरक्षा के नाम पर लगातार हमले करता है?

इसका जवाब इजरायल के अंदर से ही आ रहा है. पिछले साल के मध्य में इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक ने गुमनामी से बाहर आकर यह चेताया था कि इजरायल की स्थिति खराब हो रही है और नस्लभेद पर आधारित हिंसा की शुरुआत हो सकती है. 2003 में इजरायल में खासा राजनीतिक रसूख रखने वाले अव्राहम बुर्ग ने भी ऐसी ही चेतावनी दी थी और कहा था कि यह भविष्य में नहीं होगा बल्कि होने लगा है.

जनसंख्या की संरचना को लेकर इस देश में शुरू से दिक्कत रही है. इजरायल की नीति बड़ी संख्या में यहूदी लोगों की लाने की रही और उन्हें जमीन का स्वामित्व देने की रही. जब एक हद से अधिक यह अव्यावहारिक लगने लगा तो यह तय किया गया कि अलग-अलग कर दिया जाए. दो देश के समाधान के सिद्धांत को 2000 में त्याग दिया गया लेकिन अब भी यह मांग रह-रहकर उठती है.

 

2008 में शांति प्रक्रिया फिर से शुरू करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति जाॅर्ज बुश ने आखिरी कोशिश करते हुए दोनों पक्षों को अमेरिका में एक मंच पर लाया. उस वक्त कथित तौर इजरायल दक्षिण पंथी प्रभुत्व से उबर रहा था. लेकिन उस वक्त इजरायल के विदेश मंत्री ने यह मांग रख दी कि बातचीत तब ही आगे चल सकती है जब फिलीस्तीन इजरायल को यहूदी राष्ट्र मान ले. इसका मतलब यह हुआ कि शरणार्थियों के वापस लौटने का अधिकार खत्म हो जाता और इजरायल के अंदर के फिलीस्तीनियों की नागरिकता का सवाल भी अनिश्चित हो जाता. फिलीस्तीन अगर यह मान लेता तो उसके लिए यह सामूहिक खुदकुशी होती. अमेरिकी विदेश सचिव कोंडलिजा राइस को इजरायल की मांग अटपटी तो लगी लेकिन बाद में वह इजरायल को प्राथमिकता देने वाली अमेरिकी नीति पर वापस लौट गईं.

 

ओबामा प्रशासन के दौर में व्यावहारिक रुख अपनाने की कोशिश हुई. लेकिन ट्रंप ने पूरी तरह से इजरायल का साथ देने का संकेत दिया है. इजरायल एक बार फिर अपने पड़ोस में हमले कर रहा है तो पूरी दुनिया को इसके खतरनाक परिणामों के बारे में चिंता करने की जरूरत है. ऐसे में प्रतिष्ठित नाटककार और पटकथा लेखक टोनी कुशनर की बात सही लगती है जिसमें उन्होंने इजरायल को ‘ऐतिहासिक भूल’ माना था.

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