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बगैर मजदूरी का काम

देर से मिल रही मजदूरी और मजदूरी में अपर्याप्त बढ़ोतरी की वजह से रोजगार गारंटी योजना की आत्मा को चोट पहुंच रही है

 

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के तहत समय से मजदूरी का भुगतान एक अहम तत्व है. इस कानून की प्रगति पर नजर रखने वाली संस्था नरेगा संघर्ष मोर्चा के मुताबिक फरवरी, मार्च और अप्रैल के क्रमशः 64 प्रतिशत, 86 प्रतिशत और 99 प्रतिशत मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ है. हालांकि, मजदूरी का भुगतान नहीं होना और देर से भुगतान होना मनरेगा में नया नहीं है लेकिन हालिया बदलावों में समस्या और बढ़ी है.

नरेंद्र मोदी सरकार ने लीकेज रोकने के लिए नैशनल इलैक्ट्राॅनिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम के तहत भुगतान कराने का निर्णय लिया. आधार से जुड़े बैंक खातों में भुगतान की व्यवस्था भी शुरू हुई. यह सोच अच्छी है कि मजदूरों तक बगैर किसी लीकेज के मजदूरी पहुंचे लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी व्यावहारिकता चिंताजनक बनी हुई है. ऐसे उपाय समय के साथ प्रभावी साबित हो सकते हैं लेकिन शुरुआत में ये विकेंद्रित भागीदारी वाले विकास प्रक्रिया को उलटा कर देते हैं.

 

पहले यह व्यवस्था कि इसमें शामिल एजेंसियां अपने खाते से एक अधिकृत व्यक्ति के हस्ताक्षर से भुगतान करती थीं. इससे स्थानीय संस्थाओं को मजबूत करने का काम किया जा रहा था. नई व्यवस्था के तहत पैसे भारत सरकार के पास रहेंगे और क्रियान्वयन करने वाली संस्थाओं को सिर्फ काम कराने की रकम बताई जाएगी. क्रियान्वयन करने वाली एजेंसियों को मस्टर रोल के जरिए मजदूरी का दावा करना पड़ेगा. यह प्रक्रिया मशीनी है. इसमें मानवीय हस्तक्षेप नहीं है और लीकेज से मुक्त है. लेकिन इस तंत्र में कई कमजोरियां भी हैं.

 

पहली समस्या तो यह है कि इसमें लंबे समय तक एफटीओ लंबित रहते हैं. एमआईएस के आंकड़े बताते हैं कि 19 अप्रैल 2018 को 2017-18 के 19.55 फीसदी एफटीओ लंबित थे और 2.38 फीसदी खारिज हो गए थे. कुल मिलाकर यह आंकड़ा 21.93 फीसदी पर पहुंच जाता है. कई राज्यों से यह खबर भी मिली है कि तीन-चार महीने तक मजदूरी श्रमिकों के खाते में नहीं पहुंचती. आपूर्तिकर्ताओं के भुगतान में भी यही समस्या आ रही है.

 

अगर केंद्र सरकार बकाया नहीं देती तो राज्य सरकार अपने खजाने से पैसा देने और बाद में इसे केंद्र से लेने में सक्षम नहीं हैं. 2016-17 में मनरेगा का बकाया 12,000 करोड़ रुपये था. यह कुल बजट आवंटन का तकरीबन 25 फीसदी है. झारखंड और त्रिपुरा जैसे राज्यों ने अपने संसाधनों से भुगतान कर दिया. नई व्यवस्था लागू होने से अब यह संभव नहीं है. ऐसा करके मजदूरों के उस अधिकार का उल्लंघन किया जा रहा है जिसके तहत उन्हें 15 दिनों के अंदर भुगतान की गारंटी दी गई है. मजदूरी समय से नहीं मिलने से इस कार्यक्रम का कोई मतलब नहीं रहेगा. समय के साथ मजदूरों में इस कार्यक्रम का आकर्षण कम होता जाएगा और वे दूसरे मुश्किल कामों और पलायन के लिए बाध्य होंगे. गरीबों को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए रोज नगद पैसे चाहिए. ऐसे में देरी से होने वाला भुगतान इस कार्यक्रम की आत्मा को चोट पहुंचा रहा है.

 

दूसरी बात यह कि केंद्रीकृत प्रक्रिया से पंचायती राज्य संस्थाओं को सशक्त बनाने का काम प्रभावित हो रहा है. 25 साल से यह संघीय ढांचे में संवैधानिक संस्था के तौर पर काम कर रही हैं लेकिन अब भी ये कमजोर स्थिति में हैं. मनरेगा ने कई राज्यों में इन संस्थाओं को मजबूत बनाया था. पहली बार कई ग्राम पंचायतों के बैंक खाते खुले और इसमें नियमित तौर पर पैसे आए. यह प्रक्रिया नई भुगतान प्रणाली के आने से अप्रासंगिक हो गई है.

 

देरी से होने वाले भुगतान पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है. साथ ही मजदूरी नीति की समीक्षा भी जरूरी है. ग्रामीण विकास मंत्रालय हर साल कृषि मजदूरों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आंकड़ों के आधार पर मजदूरी संशोधित करता है लेकिन कई राज्यों में न्यूनतम और वास्तविक कृषि मजदूरी मनरेगा मजदूरी से अधिक हो गई है. यह 2006 में इस कार्यक्रम की शुरुआत के वक्त की स्थिति से बिल्कुल उलट है. उस वक्त मनरेगा के तहत न्यूनतम मजदूरी 60 रुपये थी और कई राज्यों में कृषि मजदूरी इससे कम थी.इस वजह से इस कार्यक्रम के प्रति श्रमिक आकर्षित हुए. इससे ग्रामीण श्रम बाजार में मजदूरी बढ़ी. अब यह स्थिति बिल्कुल उलटी हो जाने से मनरेगा कई राज्यों में अनाकर्षक हो गया है. इसकी पुष्टि इससे भी होती है कि महिलाएं इसके तहत रोजगार मांगती हैं और पुरुष अधिक आकर्षक दूसरे कामों की ओर रुख कर रहे हैं.

 

न्यूनतम मजदूरी और वह भी प्रभावी मजदूरी से कम देना सिर्फ कानूनी प्रावधानों को मानना भर है. क्या मजदूरी में संशोधन करके इसे और प्रभावी गारंटी नहीं बनाया जाना चाहिए? मनरेगा को सफल बनाने के लिए समय पर भुगतान और बाजार में चल रही मजदूरी के हिसाब से मजदूरी में संशोधन बेहद जरूरी है.

 

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