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वकीलों पर जरूरी कानूनी नियंत्रण

बार काउंसिलों को उन वकील संघों को नियंत्रित करना चाहिए जो न्याय प्रक्रिया में बाधा पहुंचाते हों

 

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वकीलों द्वारा कानून की अनदेखी का हालिया मामला जम्मू कश्मीर के कठुआ में सामने आया. जम्मू बार एसोसिएशन के सदस्यों ने पुलिस को आठ साल की एक बच्ची के बलात्कार के मामले में आरोप पत्र दाखिल करने से रोकने की कोशिश की. ये वकील यहीं नहीं रुके बल्कि इन लोगों ने हड़ताल करके जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय के कामकाज को ठप कर दिया. इन लोगों ने 11 अप्रैल को बंद का आह्वान किया और कठुआ की पीड़िता के परिजनों के वकील को भी धमकाया. जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में वकीलों के रवैये का संज्ञान लिया तब जाकर जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय का कामकाज शुरू हो पाया.

 

2003 में हरीश उप्पल बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि वकीलों को हड़ताल का, बहिष्कार का और यहां तक की सांकेतिक हड़ताल का भी कोई अधिकार नहीं है. उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा था कि कोई भी बार काउंसिल या बार एसोसिएशन ऐसी बैठक नहीं बुला सकती जिसमें हड़ताल या बहिष्कार के प्रस्ताव पर चर्चा होनी हो. अगर कोई ऐसी बैठक करता भी है तो इन्हें दरकिनार किया जाना चाहिए.

कई सालों से वकील हड़ताल, बहिष्कार और विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. 2016 में समाचार चैनलों पर दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में कुछ वकील पत्रकारों और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र नेताओं पर हमला करते दिखे थे. इन वकीलों ने बाद में राष्ट्रवाद के नाम पर अपने हमले का बचाव भी किया. उसी साल बेंगलुरु में वकीलों ने हिंसा को अंजाम दिया और केरल में लंबे समय तक हड़ताल किया.

 

2008 में लखनउ के एक वकील मोहम्मद शोएब पर फैजाबाद अदालत में वकीलों ने ही यह कहते हुए हमला किया कि वह एक ‘आतंकवादी’ का बचाव कर रहे हैं. कई बार एसोसिएशन ने प्रस्ताव पारित करके तथाकथित ‘आतंकवादियों’ का वकील बनने से अपने सदस्यों पर पाबंदी लगाई. बस्तर में जगदलपुर लीगल एड ग्रुप को इस आरोप की वजह से जमीन पर से हटना पड़ा कि वह माओवादियों का साथ दे रही है. यह बार काउंसिल आॅफ इंडिया के नियमों का उल्लंघन है. वकीलों के लिए बनाई गई इसकी संहिता के नियम 11 के मुताबिक वकील इस बात के लिए बाध्य हैं कि अगर कोई विशेष परिस्थिति नहीं हो तो उसे फी लेकर किसी भी अदालत या ट्राइब्यूनल में पेश होना है.

कार काउंसिल वैधानिक संस्था है. लेकिन बार एसोसिएशन अक्सर बहिष्कार और प्रदर्शन करते हैं. ये एसोसिएशन वकीलों के रोजमर्रा की गतिविधियों में ज्यादा प्रभावी हैं. लेकिन यह बार काउंसिल की जिम्मेदारी है कि वह वकीलों के व्यवहार को नियंत्रित करे. लेकिन हड़ताल करने वाले वकीलों के खिलाफ बार काउंसिल ने कभी भी कोई कार्रवाई नहीं की. हालिया मामले में तो उच्चतम न्यायालय को दखल देना पड़ा.

 

वकीलों के अक्सर होने वाले हड़ताल और विरोध-प्रदर्शनों की वजह से अदालतों में लंबित मामलों की संख्या बढ़ रही है. विधि आयोग ने अपनी 266वीं रिपोर्ट में 2017 में यह बताया था कि सिर्फ निचली अदालतों में 2.5 करोड़ मामले लंबित हैं और वकीलों द्वारा किए जाने वाले हड़तालों से व्यर्थ होने वाला समय इसकी एक प्रमुख वजह है. कई बार मामलों का स्थगन वकीलों के विरोध-प्रदर्शन की वजह से होता है.

 

वकीलों को भारतीय समाज में सम्मान की नजर से देखा जाता है. खास तौर पर गरीब लोग उन्हें न्याय दिलाने का माध्यम मानते हैं. कानून का अनुपालन और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा काफी हद तक वकीलों के कामकाज पर निर्भर करता है. बार एसोसिएशन के कामकाज को नियंत्रित करने के उपाय होने चाहिए और वकीलों में नैतिकता और सत्यनिष्ठा बढ़ाने वाली कानूनी शिक्षा दी जानी चाहिए. हड़ताल करने के बजाए वकीलों को दूसरे माध्यमों से विरोध जताना चाहिए. उसे प्रेस विज्ञप्ति जारी कर सकते हैं या अदालत परिसर से अलग शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर सकते हैं. ताकि वकालत के पेशे की नैतिकता और जिम्मेदारियों के खिलाफ काम करते वे न दिखें.

 

लेकिन जब कठुआ की तरह कानून के रक्षक ही सड़क पर उतर जाएं और हिंसक हो जाएं तो फिर उस छोटी बच्ची के गरीब परिजन न्याय की उम्मीद कैसे रख पाएंगे? अब वक्त आ गया है कि भारत में वकील आत्मनियंत्रण की दिशा में ठोस कदम उठाएं और खुद को कानून का रक्षक बनाएं न कि वे भक्षक की तरह दिखें.

Updated On : 27th Apr, 2018

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