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कठुआ को याद रखें

एक बार ठहरकर सोचिए कि क्या अनैतिकता, निर्ममता और अन्याय को धर्म और राजनीति के नाम पर सही ठहराया जा सकता है? 

 
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

जम्मू से 72 किलोमीटर की दूरी पर कठुआ में बक्करवाल-गुज्जर समाज की एक आठ साल की लड़की की निर्ममता से की गई हत्या और कई बार हुए बलात्कार की घटना बेहद डरावनी है. लेकिन जांच के बाद आरोपियों की गिरफ्तारी से हमारे समाज के स्याह पक्ष उभरकर सामने आ रहे हैं. हम ऐसी स्थिति में कैसे पहुंच गए हैं कि एक बच्चे के बलात्कार और हत्या का मामला सांप्रदायिक वैमनस्य को बढ़ाने का जरिया बन जा रहा है और इससे अपराधियों को सह मिल रही है?

 

इस बच्ची का अपहरण 10 जनवरी को हुआ. तब से लेकर 17 जनवरी को उसकी क्षत-विक्षत शव मिलने के बीच इसके साथ क्या-क्या हुआ, इसकी जानकारी रूह को कंपा देने वाली है. उसका अपहरण हुआ, उसे ड्रग्स दिया गया, एक मंदिर में कैद करके रखा गया, कई बार उसे पीटा गया और उसका बलात्कार किया गया और फिर उसे मारकर फेंक दिया गया. इस मामले में आरोपी स्थानीय पुलिसकर्मी भी हैं. इनमें से एक ऐसा है जो उस लड़की के बारे में सब कुछ जानते हुए भी उसके पिता की शिकायत पर गठित जांच दल में भी शामिल था.

 

जब राज्य सरकार ने इस मामले की जांच के आदेश दिए और पुलिसकर्मी समेत दूसरे संदिग्धों को गिरफ्तार किया जाने लगा तो इस मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया. बलात्कार और हत्या की निंदा करने और इस मामले में न्याय की मांग करने के बजाए स्थानीय नेताओं और वकीलों ने राज्य पुलिस की मंशा पर संदेह जताते हुए मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की मांग उठाई. संदिग्धों को मिले इस सार्वजनिक समर्थन देने वालों में भाजपा समर्थित हिदू एकता मंच भी शामिल था. वकीलों ने तो पुलिस को आरोपपत्र दाखिल करने से रोकने की कोशिश की. इस पूरे मामले में एक बच्ची के बलात्कार, शोषण और हत्या का मामला पीछे हो गया.

इस मामले का व्यापक राजनीतिक संदर्भ भी है. भाजपा को जम्मू क्षेत्र में इतना समर्थन मिला कि वह राज्य में खड़ी हो पाई. वह पीडीपी के साथ मिलकर सरकार चला रही है. इसके बावजूद जम्मू और कश्मीर घटी के बीच सांप्रदायिक धु्रवीकरण वाली राजनीति बरकरार है. ऐसे में यह हैरान करने वाला नहीं है कि पीड़ीत के मुस्लिम होने और आरोपियों के हिंदू होने की वजह से इस मामले को सांप्रदायिक रंग दिया जाए. लेकिन एक छोटी बच्ची के क्षत-विक्षत शव पर इस तरह की राजनीति ने दिखा दिया है कि भारतीय राजनीति कितने निम्न स्तर पर पहुंच गई है.

 

हमें इस मामले को व्यापक ढंग से देखना चाहिए. पहली बात तो यह कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराध, अत्याचार, बलात्कार और घरेलू हिंसा इस देश में बेहद आम है. आंकड़े आधी सच्चाई भी नहीं बताते. महिलाओं और लड़कियों पर घरों के अंदर, सड़कों पर, खेतों में और जंगल में हमले किए जाते हैं, उन पर अत्याचार होता है और वे यौन शोषण की भी शिकार होती हैं. कड़े कानूनों से खास बदलाव नहीं आया. 2012 में पोक्सो कानून लागू हुआ था. 2013 में बलात्कार से संबंधित कानून में संशोधन करके फांसी का प्रावधान किया गया था. इसके बावजूद बलात्कार और बच्चों के शोषण की घटनाएं कम नहीं हुईं. कानून तब ही प्रभावी हो सकता है जब उसे लागू करने वाला तंत्र प्रभावी हो.

 

दूसरी बात हमें यह समझनी चाहिए कि यह घटना जम्मू में हुई थी. उसी राज्य की कश्मीर घाटी में बलात्कार की कई घटनाएं होती हैं लेकिन पूरे देश में इनके खिलाफ गुस्सा नहीं दिखता. न्याय तंत्र में खामी के साथ-साथ इस राज्य की महिलाओं को सशस्त्र बलों को विशेषाधिकार देने वाले कानून की वजह से भी परेशानी हो रही है. इससे वर्दी वाले जवान ऐसे अपराध करके भी बच जाते हैं.

तीसरी बात यह कि जब विभिन्न समुदायों के बीच विष फैलाने का काम राजनीति करती है तो महिलाओं का इस्तेमाल दूसरे समुदाय को सबक देने के लिए होता है. बंटवारे के बाद से इस चीज को हमने लगातार अलग-अलग हिस्से में देखा है और यह अब तक नहीं बंद हुआ. लेकिन आज एक नया मोड़ यह दिखता है कि इस तरह का अपराध करने वाले इस बात को लेकर निश्चिंत दिखते हैं कि उनके समर्थक उन्हें बचा लेंगे. इसके अलावा उस बच्ची के हत्यारों के बचाव की कोई और वजह नहीं दिखती?

 

यह जरूरी है कि दूसरी बच्चियों को इस तरह के अत्याचार से बचाने के लिए व्यवस्थागत बदलाव किए जाएं. पुलिस थानों में पीड़ितों को सहानुभूति नहीं मिलती. अगर मामला दर्ज किया जाए और जांच भी हो तो भी इस बात की गारंटी नहीं रहती कि न्याय मिल पाएगा. लचर जांच और दिलचस्पी नहीं लेने वाले वकील यह लगभग सुनिश्चित कर देते हैं कि न्याय न मिल सके. हमारा न्याय तंत्र ध्वस्त हो गया है. इसे ठीक करने की जरूरत है.

 

हमें लगा था कि 16 दिसंबर, 2012 को हुई घटना महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के लिहाज से बदलाव लाने में निर्णायक होगी. इस छोटी बच्ची के साथ जो हुआ, उसके बाद हर भारतीय को ठहरकर खुद से यह पूछना चाहिए कि एक समाज के तौर पर हम कहां जा रहे हैं. क्या हम उस दिशा में जा रहे हैं जहां अनैतिकता, निर्ममता और अन्याय को धर्म और राजनीति के नाम पर सही ठहराया जा रहा है? या मानवता जगेगी और हमें यह अहसास होगा कि सारी जिंदगी बेशकीमती है और अपराध का कोई धर्म नहीं होता?

 

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