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बांटो और भ्रमित करो

तीन तलाक को आपराधिक घोषित करना मुस्लिमों और विपक्ष को बांटने की एक सोची-समझी चाल है

 
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

नए साल की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह दावा किया कि उनकी सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि अब मुस्लिम महिलाएं बगैर किसी पुरुष के अकेले भी हज पर जा सकती हैं. यह सच को तोड़-मरोड़कर पेश करने का एक और उदाहरण है. इसे सफेद झूठ भी कहा जा सकता है. 2015 में सउदी अरब सरकार ने नियमों में बदलाव करके यह कहा था कि 45 साल से अधिक उम्र की महिलाएं अगर चार की समूह में हैं तो वे किसी पुरुष के बगैर भी हज पर आ सकती हैं. किसी दूसरे देश में प्रवेश की नियमों को कोई और देश नहीं तय कर सकता. इसलिए यह निर्णय सउदी अरब का था. सवाल यह उठता है कि गाय के नाम पर परेशानी झेल रहे मुस्लिम पुरुषों के प्रति उदासीन मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के प्रति अचानक से इतनी फिक्रमंद कैसे हो गई है?

 

तीन तलाक को अपराध बनाने वाला विधेयक लोकसभा में बगैर बहस के पारित करा लिया गया. सवाल यह भी उठता है कि आखिर एक साथ दिए जाने वाले तीन तलाक का विरोध करने वाली मुस्लिम महिलाओं के संगठनों से कानून बनाने की प्रक्रिया में क्यों नहीं संपर्क किया गया. इस विधेयक के संसद में पेश होने के कुछ हफ्ते पहले ऐसे ही एक संगठन ने इस प्रस्तावित कानून पर व्यापक रायशुमारी का सुझाव दिया था. इस संगठन ने इसे अपराध घोषित करने का विरोध करते हुए यह कहा था कि महिलाओं के लिए ऐसे कानूनों पर पहले भी व्यापक रायशुमारी होती रही है. इसने कहा था कि शादी दो व्यस्क लोगों के बीच एक सिविल कांट्रैक्ट है, इसलिए इसे तोड़ने का तरीका भी सिविल होना चाहिए न कि आपराधिक. यह तरीका ऐसा होना चाहिए जो महिलाओं को मजबूत करे न कि उन्हें और जोखिम में डाले.

 

अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे तलाक को पहले ही अवैध घोषित कर दिया है. ऐसे में इस कानून की क्या जरूरत थी? लेकिन उस फैसले में अल्पमत वाले जजों ने कानून बनाने को कहा था. अगर ऐसे में कानून बनाना ही था तो उसे आपराधिक क्यों बनाया गया? क्या सिविल विकल्प उपलब्ध नहीं थे? क्या उन संभावनाओं को टटोला गया?

 

ऐसे में कोई भी यह सोचने को मजबूर हो सकता है कि सरकार मुस्लिम महिलाओं के भले के मकसद से नहीं काम कर रही है. भाजपा मुस्लिम महिलाओं को अपने पाले में लाकर मुस्लिम एकता को तोड़ना चाहती है. उम्मीद के मुताबिक मुस्लिम बुद्धिजीवी इस विधेयक के विरोध में सामने आए हैं. इन लोगों ने पहले मुस्लिम महिलाओं की तीन तलाक की समस्या पर कुछ नहीं किया. परिणाम स्वरूप आज एक तरफ अपनी वाजिब जरूरतों के साथ मुस्लिम महिलाएं हैं तो दूसरी तरफ इसकी परवाह किए बगैर इसका राजनीतिक फायदा उठाने की ताक में बैठी एक राजनीतिक पार्टी है.

 

यह साफ है कि यह सियासी चाल काम कर रही है. कोई राजनीतिक दल इस विधेयक के विरोध में नहीं आया. कांग्रेस समेत कोई भी राजनीतिक दल मुस्लिम महिलाओं के विरोध में मुस्लिम पुरुषों के पक्ष में नहीं दिखना चाहती. इससे साफ है कि भाजपा ने धर्म को अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करने की रणनीति एक बार फिर अपना ली है.

 

यह बात भुला दी गई है कि तीन तलाक का मसला मुस्लिम महिलाओं ने उठाया था, इस सरकार ने नहीं. इन महिलाओं ने अपने मौलिक अधिकारों के हनन का प्रश्न उठाते हुए अदालत का रुख किया था. वहां वे जीतीं. उन्होंने इसे आपराधिक बनाने की मांग नहीं की थी. अब ये समूह मुश्किल में हैं. एक तरफ कुछ वैसी मुस्लिम महिलाएं हैं जिन्हें लगता है कि कठोर कानून बनाने से उनकी हालत सुधरेगी. वहीं दूसरी तरफ उन्हें यह जानना चाहिए कि इसमें मेनटेंनेंस की बात नहीं है और एक बार पुरुष जेल चला गया तो समझौते की कोई संभावना नहीं बचेगी. ऐसा प्रावधान महिलाओं को और मुश्किल में डाल सकता है. नए कानून के तहत पुलिस किसी तीसरे पक्ष की शिकायत के आधार पर भी कार्रवाई कर सकती है. कई कानूनी जानकारों का मानना है कि नए कानून के बाद पुरुष अपनी पत्नी को बगैर तलाक दिए छोड़ सकते हैं. इससे उन्हें कानूनी पचड़े में नहीं पड़ना पड़ेगा.

 

जिस सनक के साथ यह पूरा काम किया जा रहा है, वह परेशान करने वाला है. हर तरह से मुस्लिमों का विरोध करने वाली पार्टी का मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात करना भी कई सवाल खड़े करता है.

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