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आजादीः भारतीय शोषण से मुक्ति

बर्नार्ड डिमेलो इकाॅनोमिक ऐंड पाॅलिटिकल वीकली के डिप्टी एडीटर हैं।

कश्मीर के मुसलमान 27 साल से सैन्य शासन और सुरक्षा बलों की ज्यादतियों को झेल रहे हैं

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कश्मीर घाटी की भयंकर सर्दी हाड़ कंपा देती है लेकिन फिर भी यह लोगों की भावनाओं को ठंढा नहीं कर पा रही है। सर्दियों में सैंकड़ो भारतीय सुरक्षाकर्मी एक घर में छिपे कुछ आतंकियों को मारने के लिए आए। लेकिन स्थानीय लोग आतंकियों के समर्थन में आ गए और उन्हें भागने तक में मदद की। सुरक्षा बलों के लिए स्थानीय लोगों का यह रवैया निश्चित तौर पर ‘राष्ट्र विरोधी’ था और उन्हें स्थानीय लोगों से कड़ाई से निपटने में कोई हिचक नहीं है।  

यह एक तथ्य है कि कई स्थानीय लोग आतंकियों को बचाकर अपनी जिंदगी खतरे में डाल देते हैं। जो आतंकी मारे जाते हैं, उनमें से अधिकांश उसी पूर्वी कश्मीर के हैं, जो भारत के कब्जे में है। पाकिस्तानी कब्जे वाले पश्चिमी कश्मीर के कम ही आतंकी होते हैं। स्थानीय लोग इन मौतों का जबर्दस्त विरोध करते हैं। जब ये विरोध गति पकड़ लेते हैं तो सुरक्षा बलों द्वारा विरोध करने वालों पर फायरिंग की जाती है। इससे विरोध और बढ़ जाता है।

एक तरह से कहा जाए तो कश्मीरी लोग 27 साल से सैन्य शासन झेल रहे हैं। जिसमें पूरे इलाके को प्रभावित मानकर सुरक्षाकर्मियों को कुछ भी करने की छूट मिली हुई है। चाहे वे बलात्कार करें, अपहरण करें, किसी को टाॅर्चर करें या फिर किसी की हत्या ही क्यों न कर दें। एसोसिएशन आॅफ पैरेंट्स आॅफ डिस्अपियरड पर्सन्स ने 10 जनवरी, 2017 को एक बयान जारी करके बताया है कि पिछले 8 जुलाई से जो असंतोष की आग जलनी शुरू हुई उसके बाद से 100 से अधिक आम नागरिक मारे गए हैं। एक हजार से अधिक लोग पैलेट गन की वजह से या तो अंधे हो गए हैं या फिर गंभीर रूप से घायल हैं। पब्लिक सेफ्टी कानून, 1978 के तहत एक ही साथ समूह में लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। सरकार के आधिकारिक आंकड़े तकरीबन 8,000 गिरफ्तारियों की बात बताती है। यहां कफ्र्यू, मीडिया और इंटरनेट पर रोक और अभिव्यक्ति की आजादी और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्रित होने जैसे मौलिक अधिकारों का निलंबन बेहद आम हो गया है।

इन तथ्यों के आधार पर उन परिवारों के दर्द को समझा जा सकता है जिनका कोई न कोई सदस्य अचानक गायब हो गया है। एपीडीपी के मुताबिक 1989 से अब तक आठ से दस हजार कश्मीरी गायब हुए हैं और फर्जी मुठभेड़ में मारे गए हैं। उमर अब्दुल्ला की अगुवाई वाली जम्मू कश्मीर सरकार ने विधानसभा में इस आंकड़े को 3,744 बताया था। लेकिन भारत सरकार इन बातों को खारिज करती रही है और हिंसा के शिकार लोगों को ही हिंसा का जिम्मेदार ठहराते आई है। एपीडीपी हर महीने की दस तारीख को मौन धरना देकर इसका विरोध करती है। यह संस्था एक स्मृति कैलेंडर भी जारी करती है और इस बात के लिए प्रतिबद्ध दिखती है कि गायक होने वाले लोगों और उनकी परिवार की परेशानियां जाया न हो जाए। लेकिन ऐसा लगता है कि राज्य में सत्ता में काबिज होने वाली सभी सरकारों में कोई गठजोड़ है। क्योंकि अब तक इस तरह से गायब हो रहे लोगों के विषय पर विधानसभा ने कोई प्रस्ताव नहीं पारित किया। केंद्र सरकार भी इस विषय के प्रति संवेदनशील नहीं दिखती। अन्यथा वह लोगों के जबरन गायब होने वाले अंतरराष्ट्रीय संधि को लागू करती।

मूल बात यह है कि पिछले 27 साल से भारत अपनी सैन्य ताकत का इस्तेमाल कश्मीर घाटी के लोगों पर कर रहा है। इनमें से कई लोग भारत में नहीं रहना चाहते। भारत सरकार इसे धर्मनिरपेक्षता और सीमाओं की अखंडता के नाम पर सही ठहराती है। कश्मीर घाटी में जो हो रहा है, उसके लिए भारत सरकार पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराती है। इसके बावजूद मौजूदा सरकार का राष्ट्रवाद भारतीय राष्ट्रवाद नहीं बल्कि हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद लगता है। जो सिर्फ भारत के एक वर्ग के लोगों की नुमाइंदगी करता है। हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कश्मीरी मुसलमानों पर अपना शासन थोपना चाहते हैं। कहना जरूरी नहीं कि राष्ट्रवाद का कांग्रेसी संस्करण भी कम नहीं है। न ही पाकिस्तानी राष्ट्रवादी किसी तरह से इससे अच्छा है। अब हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादियों ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान में चल रहे अभियान को समर्थन देने की घोषणा की है तो पाकिस्तानी राष्ट्रवादियों ने भी भारत से कश्मीर की आजादी की अपनी बात दोहराई है। जबकि एक सच यह भी है कि पाकिस्तानी राष्ट्रवादियों ने आजाद कश्मीर को अपना उपनिवेश बना रखा है। लेकिन जिस तरह से भारत सरकार 27 सालों से सैन्य ताकत का इस्तेमाल कश्मीर में कर रही है, उससे तो यही लगता है कि कश्मीरी लोगों की आजादी की मांग उनके दिल से निकली हुई है और वे भारतीय शोषण से मुक्ति चाहते हैं।

 

Updated On : 13th Nov, 2017

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