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ट्रंप और पर्यावरण

व्हाइट हाउस में पर्यावरण पर संवेदनशीलता नहीं दिखाने वाले व्यक्ति का होना दुनिया के लिए चिंता का विषय है

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

डोनल्ड ट्रंप के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने 27 जनवरी को सात देशों के नागरिकों के अमेरिका आने पर तीन से चार महीने का जो प्रतिबंध लगाया उसकी चर्चा चारो तरफ है। ये सात देश हैंः इराक, ईरान, लिबिया, सोमालिया, सूडान, सीरिया और यमन। इस चर्चा में पर्यावरण समझौते को लेकर ट्रंप के रवैये की चर्चा कहीं पीछे छूट गई। जिस तरह से ट्रंप के वीजा प्रतिबंध का दुनिया भर में असर दिख रहा है, उसी तरह का असर पर्यावरण के प्रति उनके रवैये का भी पड़ेगा। उनके मौजूदा कदमों और भविष्य में संभावित कदमों का अमेरिका के ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर पड़ेगा। मालूम हो कि इन गैसों का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अगर इसमें और तेजी आती है तो पूरी दुनिया में पर्यावरण संरक्षण को लेकर चल रही कोशिशों को झटका लगेगा। 

पर्यावरण को लेकर ट्रंप के रवैये का अंदाजा उनके चुनाव अभियानों के दौरान ही लगने लगा था। इसलिए पर्यावरण संरक्षण एजेंसी यानी ईपीए के अस्थाई प्रमुख के तौर पर मेरन इबिल और स्थाई प्रमुख के तौर पर स्काॅट प्रूइट का चयन हैरान करने वाला नहीं रहा। इबिल सार्वजनिक तौर पर यह कहते रहे हैं पर्यावरण संरक्षण को लेकर चलने वाले अभियान आधुनिक दुनिया की आजादी और समृद्धि के लिए बहुत बड़ा खतरा है। पर्यावरण के प्रति प्रूइट का रवैया भी जगजाहिर है। ओकोहामा के अटाॅर्नी जनरल के तौर पर उन्होंने तेल कंपनियों की ओर से अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के खिलाफ 14 मुकदमे दायर किए थे। अब ऐसे ही लोगों पर पर्यावरण की रक्षा करने की जिम्मेदारी है। ऐसे में क्या होगा, इसकी उम्मीद की जा सकती है।

शपथ लेने के कुछ ही दिनों के अंदर ट्रंप ने ईपीए को पैसे जारी करने पर रोक लगा दी और एजेंसी के 15,000 इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की संख्या में कमी करने का आदेश दे दिया। हालांकि, उन्होंने अपने चुनाव अभियान के दौरान इसे खत्म कर देने की बात की थी। ट्रंप ने यह आदेश भी दिया है कि ईपीए के कर्मचारी शोध या अन्य विषयों पर मीडिया समेत किसी से बातचीत नहीं कर सकते। इसका मतलब यह हुआ कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर नए आंकड़े सार्वजनिक नहीं हो पाएंगे। व्हाइट हाउस पर जलवायु परिवर्तन का जो वेब पेज था, उसकी जगह एक ऐसे पेज ने ले लिया है जो अमेरिकी उर्जा जरूरतों की योजना की बात करता है। इस योजना में इस बात का जिक्र है कि आने वाले दिनों में 50 अरब डाॅलर के शेल गैस, तेल और प्राकृतिक गैस निकालने पर काम किया जाएगा। दूसरे शब्दों में कहें तो इसका मतलब यह है कि ट्रंप के पहले के अमेरिकी प्रशासन ने जलवायु परिवर्तन और अक्षय उर्जा को लेकर जो काम किए हैं, अब ट्रंप प्रशासन उन्हें दरकिनार कर रहा है। इसका मतलब यह भी हुआ कि जीवाश्म ईंधन लाॅबी बगैर किसी रोक-टोक के अपने कामों में तेजी लाने वाली है। यह सब कुछ होगा अमेरिका को एक बार फिर से महान बनाने के नाम पर।

सिर्फ अमेरिका के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए इसके गंभीर परिणाम होंगे। अमेरिका ने क्योटो प्रोटोकाॅल पर भी दस्तखत नहीं किया था। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को काबू में करने के लिए यह पहला वैश्विक समझौता था। हालांकि, 2015 में बराक ओबामा के नेतृत्व में अमेरिका पेरिस समझौते में सबके साथ खड़ा हुआ। इसके तहत हर देश ने यह बताया कि वह इन गैसों के उत्सर्जन में कितनी कमी करेगा। अमेरिका ने 2030 तक 2005 के स्तर से कार्बन उत्सर्जन में 30 फीसदी कमी लाने का वादा किया था। यह भी कहा जा रहा है कि अमेरिका 27 फीसदी कमी कर चुका है। लेकिन ग्रीन हाउस गैसों में कमी लाने को लेकर कोई खास प्रगति नहीं दिख रही है। उत्सर्जन में परिवहन तंत्र की हिस्सेदारी 26 फीसदी है और कृषि की 9 फीसदी।   

ट्रंप अपने चुनाव प्रचार में यह कहते थे कि वे अमेरिका को पेरिस समझौते से अलग कर लेंगे। अगर वे ऐसा नहीं भी करते हैं तो भी ऐसा लग रहा है कि अमेरिका ने जो वादे किए हैं, उन्हें वे हाशिये पर डाल देंगे। वल्र्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट ने कहा है कि अगर सभी देशों ने पेरिस समझौते के वादों को पूरा भी किया तो भी वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस पर रोके रखना मुश्किल होगा। इस तथ्य को ध्यान में रखें तो पता चलता है कि अगर अमेरिका इससे अलग हो जाता है तो दुनिया को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।

ऐसी आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि पेरिस समझौते को लागू करने के लिए अमेरिका ने आर्थिक मदद का जो वादा किया था, अब वह उससे भी पीछे हट सकता है। संयुक्त राष्ट्र के 100 अरब डाॅलर के ग्रीन क्लाइमेट फंड में अमेरिका ने 2020 तक तीन अरब डाॅलर देने का वादा किया था। अभी तक अमेरिका ने इसमें 500 मिलियन डाॅलर ही दिए हैं। इसकी बड़ी वजह अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिक पार्टी के दबदबे को माना जाता है। ट्रंप प्रशासन के रुख को देखते हुए ऐसा लगता है कि अमेरिका आर्थिक मदद के अपने वादे से पीछे हटने वाला है।

यह बिल्कुल साफ है कि पर्यावरण संरक्षण अभियानों का नहीं मानने वाले व्यक्ति का व्हाइट हाउस में होना पूरी दुनिया के लिए कई मायने में बुरी खबर है। पहली बात तो यह कि ट्रंप प्रशासन जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देने वाला है। ऐसे में पर्यावरण नियमों का कोई मतलब नहीं रहेगा। मतलब साफ है कि पेरिस समझौते के तहत अमेरिका ने ग्रीन हाउस गैसों में कमी का जो लक्ष्य रखा है, वह पूरा नहीं होने वाला। दूसरी बात यह कि अमेरिका के इस रवैये से पर्यावरण संरक्षण को लेकर वैश्विक अभियान को बड़ा झटका लगेगा। यह कैसी विडंबना है कि युद्धग्रस्त लोगों को अपने यहां आने से अमेरिका रोक रहा है। जबकि इनमें से कई युद्धों को हवा देने में उसकी भूमिका रही है। वहीं दूसरी तरफ अब अमेरिका ट्रंप के रवैये की वजह से लाखों लोगों के पर्यावरण शरणार्थी बनाने पर आमादा है।

 
Updated On : 13th Nov, 2017

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