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अगर हादिया पुरुष होती

लोक विमर्श हमेशा लैंगिक समानता और न्याय के आसपास ही सीमित रही है

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

1980 के दशक में शाह बानो और रूप कंवर से लेकर अभी की हादिया तक कुछ चीजें जस की तस हैं. इन महिलाओं की निजी जिंदगी को लेकर जो लोक विमर्श चला है, उसमें नागरिक के तौर पर इनकी अधिकारों को लेकर चर्चा कम हुई है और इनके परिवारों, समुदाय, राजनीति, संस्कृति और परंपरा से संबंधित विषयों की अधिक चर्चा हुई है.

1985 में एक बुजुर्ग तलाकशुदा महिला ने अपने वकील पति से गुजारे के लिए रकम की मांग की और यह धार्मिक आजादी से जुड़ा एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया. 1987 में शादी के सात महीने बाद 18 साल की एक महिला का अपने पति की चिता पर जलकर मर जाना भी ऐसा ही बड़ा राजनीतिक मुद्दा उस समुदाय के लिए बन गया. 2017 में हादिया को लेकर भी यही स्थिति दिख रही है. उसे संविधान ने जीवनसाथी चुनने का अधिकार दिया है लेकिन उसका यह निर्णय राजनीति, आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ दिया गया है. ऐसे सभी मामलों के मूल में एक नागरिक के तौर पर महिलाओं की स्थिति है. लेकिन लोक विमर्श लैंगिक समानता और न्याय तक ही सीमित है.

हादिया के मामले में 27 नवंबर को सुनवाई करते वक्त सर्वोच्च न्यायालय लैंगिक स्थिति को चिंता का विषय के तौर पर स्वीकारने में अनिच्छुक दिखा. अक्टूबर में तीन जजों की पीठ ने हादिया को अदालत में पेश करने का आदेश दिया था ताकि उन्हें यह पता चल सके कि शफी जहां से उसकी शादी जबर्दस्ती तो नहीं कराई गई. जजों को लगा कि सीधे हादिया से यह बात जानी जाए. लेकिन जब  महीने भर बाद उसे अदालत में लाया गया तो ऐसा लगा कि उसे ठीक से अपनी बात से नहीं रखने दिया गया. जब वरिष्ठ अधिवक्त इंदिरा जयसिंह ने इस पर अपनी व्यथा प्रकट करते हुए कहा कि अगर हादिया पुरुष होती तो भी क्या पीठ को सवाल-जवाब करने में इतनी दिक्कत होती. इस पर जजों ने नाराजगी जाहिर की. खुद मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लिंग का मसला इस मुद्दे से कैसे जुड़ा हुआ है?

अब सवाल यह उठता है कि आखिर कैसे लिंग का मसला इससे जुड़ा हुआ नहीं है. खुद उच्च न्यायालय ने कहा था कि 24 साल की एक लड़की का शोषण कई तरह से हो सकता है और उसे अपने हिसाब से किसी के साथ भी रहने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है. अदालत ने यह भी कहा था कि भारतीय परंपरा के हिसाब से जब तक किसी लड़की की ठीक से शादी नहीं हो जाती तब तक उसे अपने अभिभावकों के पास ही रहना चाहिए. संघ परिवार के संगठन ‘लव जिहाद’ का मसला उठाते हुए यह कहते हैं कि महिलाओं के पास दिमाग नहीं है और धर्मांतरण की खातिर उन्हें शादी करने का बहला-फुसला लिया जाता है. हादिया ने शादी के साल भर पहले ही धर्म बदलने की इच्छा जताई थी. जब वे शफी जहां से आॅनलाइन साइट पर मिली, उसके महीने भर पहले उसे धर्मांतरण का प्रमाणपत्र मिल गया था.

लैंगिक आयाम इस मसले क्यों नहीं जुड़े जब दो साल से उसे अदालत और बाहर बार-बार उसे एक व्यस्क की तरह नहीं देखा जा रहा और उसकी इच्छाओं का सम्मान नहीं हो रहा. यह देखना ठीक लगता है कि महीनों से पुलिस के पहरे में पूरी दुनिया से कटी अपने करीबी परिवार वालों के साथ रहने और कई तरह के दबावों के बावजूद वह अपने ढंग से जीवन जीने को लेकर बिल्कुल स्पष्ट है.

यह मुद्दा क्यों लैंगिक स्थिति से नहीं जुड़ेगा जब उसे महीनों से आजादी से अपना जीवन नहीं जीने दिया जा रहा है? उसे अपनी पसंद-नापसंद पर पुरुषवादी प्रवचन दिए जा रहे हैं. उसे आंशिक आजादी दी जा रही है ताकि वह वह अपनी इंटर्नशिप पूरी करके अपनी डिग्री हासिल कर सके. यह सब उसे काॅलेज के हाॅस्टल में रहकर करना है.

अदालत में इस बात पर चर्चा चली थी कि काॅलेज के डीन को उसका अभिभावक घोषित किया जाएगा. लेकिन अंतिम फैसले में इसका जिक्र नहीं है. लेकिन उनके बयानों से यह स्पष्ट है कि डीन ही हादिया के अभिभाव की भूमिका में रहेंगे और वही तय करेंगे कि वह क्या करेगी और क्या नहीं. वह किससे मिलेगी और किससे नहीं. हालांकि, इस निर्णय से हादिया के पिता संतुष्ट नहीं हैं और उन्होंने फिर से कोर्ट जाने की धमकी दी है. हादिया के मामला सिर्फ लैंगिक विषय से नहीं जुड़ा हुआ है. इसमें इस्लाम के प्रति डर दिखाना और यह बात न्यायपालिका के दिमाग में बैठाते हुए इसे सांप्रदायिक राजनीति से जोड़ना भी शामिल है. लेकिन इन सबके बावजूद यह नहीं भूलना चाहिए कि हादिया की दुर्दशा की एक सबसे बड़ी वजह यह है कि वह एक महिला है.

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