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भारत की तेल संबंधी दिक्कत

जब तक भारत तेल का विकल्प नहीं अपनाता तब तक इस मोर्चे पर समस्या लगातार बढ़ेंगी

 

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कच्चे तेल की खपत के मामले में दुनिया में भारत तीसरे स्थान पर है. यहां तेल की मांग लगातार बढ़ रही है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान एक बड़े तेल आयातक देश की बन रही है. जहां अगले दो दशक तक आयात बढ़ने वाला है. भारत अपनी कुल जरूरत का 80 फीसदी तेल आयात करता है. घरेलू उत्पादन कम हो रहा है और इस वजह से तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर भारत की निर्भरता बनी रहेगी. 2014 के मध्य से तीन साल तक तेल की कीमतें भारत के अनुकूल रहीं लेकिन अब स्थिति बदल रही है.

2013-14 में 105 डाॅलर का भाव घटकर 2015-16 में 46 डाॅलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इसका काफी फायदा उठाया और अपना राजस्व बढ़ाया बजाए इसके कि इसका फायदा ग्राहकों को देते. इसका मतलब यह हुआ कि ग्राहकों को वैश्विक बाजार में कीमतों में कमी का कोई फायदा नहीं हुआ. 31 अक्टूबर को कच्चे तेल की कीमत बढ़कर 59 डाॅलर प्रति बैरल हो गई. भारत मंे अब तेल की कीमतें हर रोज तय होती हैं. लेकिन विपक्ष के दबाव में सरकार को तेल पर लगने वाला कर कम करना पड़ा.

तेल की कीमतों में कमी की कई वजहें थीं. 2011 से 2014 के बीच तेल की कीमतें अधिक होने की वजह से अमेरिका में तेल क्षेत्र में काफी निवेश हुआ और शेल से तेल उत्पादन को ठीक किया गया. तेल उत्पादन की लागत कम हुई. ओपेक ने तेल की कीमतों में कमी के बावजूद उत्पादन कम नहीं किया. क्योंकि उसे लगता था कि शेल का उत्पादन अमेरिका के लिए आर्थिक तौर पर फायदे का सौदा नहीं रहेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

तेल की कीमतों में गिरावट से ओपेक देश प्रभावित हुए. इनमें से कई का बजट बहुत हद तक तेल से होने वाली कमाई पर निर्भर था. इस वजह से 2016 के अंत में उत्पादन कम करने को लेकर एक समझौता हुआ. उसके बाद से तेल की कीमतें धीरे-धीरे बढ़ रही हैं.

आयात पर निर्भरता की वजह से भारत तेल स्रोत देशों में विविधता लाने की कोशिश में है. अभी भी भारत ओपेक देशों से अधिकांश तेल आयात करता है लेकिन तेल का जो आयात बढ़ रहा है उसमें 64.8 फीसदी हिस्सेदारी गैर ओपेक देशों का है. इसका सीधा से मतलब यह हुआ कि ओपेक द्वारा तेल उत्पादन में कटौती का फायदा दूसरे तेल उत्पादक देशों को मिल रहा है.

अब भारत अमेरिका से तेल आयात कर रहा है. यह बेहद अहम है. क्योंकि अमेरिका में तेल का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है. तेल स्रोतों में विविधता लाने से भारत ओपेक देशों से ठीक से मोलभााव करने की स्थिति में रहेगा.

ये बदलाव महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह चर्चा चल रही है कि उर्जा के नए स्रोतों को उभार से क्या तेल की मांग हमेशा के लिए कम हो जाएगी. हालांकि, यह बदलाव विकासशील देशों में धीमी है. भारत भी परिवहन के लिए तेल पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है. इससे प्रदूषण में भी कमी आएगी.

तेल की मांग भारत में बढ़ रही है. तेल के लिए भारत आयात पर निर्भर है. ऐसे में यह जरूरी है कि भारत जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता कम करे. यह आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टि से जरूरी है. आज हम जो आर्थिक निर्णय लेते हैं उससे हमारी भविष्य की पीढ़ी का जीवन स्तर तय होता है.

Updated On : 15th Nov, 2017

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