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संकटग्रस्त समुदाय

सरकारी स्कूलों को मजबूत करना एक ठोस और जरूरी कदम है

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

कल्पना कन्नाबीरन

प्रोफेसर और निदेशक, काउंसिल फाॅर सोशल डेवलपमेंट, हैदराबाद

 

हालिया सर्वेक्षण से एक बार फिर यह बात साबित हुई है कि डिनोटिफाइट खानाबदोश और अर्द्ध-खानाबदोश समुदाय किस तरह की दिक्कतों का सामना कर रहे हैं. शिक्षा, रोजगार और आपराधिक मामलों के मोर्चे पर उनकी हालत बुरी है. इन समुदायों के लिए जो राष्ट्रीय आयोग है, उसने भी इन मसलों को पहले उठाया है. इसके अलावा भी कई अन्य रिपोर्ट में ये बातें आई हैं. लेकिन इन रिपोर्ट में आंकड़ों से संबंधित जो कमियां थीं, उन्हें दूर करने के मकसद से इंडियन काउंसिल फाॅर सोशल साइंस रिसर्च यानी आईसीएसएसआर ने एक अध्ययन प्रायोजित किया. नौ राज्यों में हुए इस अध्ययन का मकसद इन समुदायों की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का जायजा लेना था.

2012 से 2015 के बीच इस अध्ययन को हैदराबाद के काउंसिल फाॅर सोशल डेवलपमेंट ने किया. इसमें मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, गोवा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के 13,000 परिवारों का अध्ययन किया गया. रेंके आयोग ने जिन 306 समुदायों की सूची बनाई है, उनमें से 76 समुदायों को इस अध्ययन में शामिल किया गया. इसमें आपराधिक माने जाने वाले और यह भेदभाव नहीं झेलने वाले, दोनों तरह के समुदायों का शामिल किया गया. इस अध्ययन में यह बात स्थापित हुई कि खराब सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति और भेदभाव में सीधा संबंध है.

जिन समुदायों का अध्ययन किया गया, उनमें अधिकांश ग्रामीण हैं. इनमें से कई 30 सालों से एक जगह रह रहे हैं. यह बताता है कि खानाबदोश होने के बजाए ये एक जगह टिकने को प्राथमिकता दे रहे हैं. पारंपरिक कार्यों को अब भी अपना प्राथमिक कार्य मानने वालों की संख्या घटी है. गुजरात में यह आंकड़ा 25 फीसदी है तो मध्य प्रदेश में 22 फीसदी. अध्ययन में यह बात भी सामने आई कि इनमें से कई गैर कृषि कार्यों में भी जीवनयापन के लिए लगे हैं. मजबूरी में होने वाला पलायन शिक्षा पर नकारात्मक असर डाल रहा है. तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ में में पलायन 40 फीसदी तो तेलंगाना में 59 फीसदी था. तेलंगाना में इसमें से 54 फीसदी साल में एक बार पलायन की बात कह रहे थे. 

तमिलनाडु में 53 फीसदी परिवारों ने गैर कृषि कार्यों को जीवन यापन का मुख्य साधन माना. कुछ राज्यों को छोड़कर सभी राज्यों में इन समुदायों के एक चैथाई लोगों ने कभी स्कूल में दाखिला ही नहीं लिया. प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के बाद शिक्षा छोड़ने वालों की संख्या अधिक है. पढ़ाई छोड़ने की सबसे बड़ी वजह के तौर पर पलायन सामने आया. मध्य प्रदेश में शिक्षकों से बातचीत करने पर पढ़ाई बरकरार नहीं रख पाने के सामाजिक वजह भी सामने आए. 

संकटग्रस्त आदिवासी समूहों में शिक्षा ठीक करने के लिए हाॅस्टल और आश्रम विद्यालयों को भी शामिल किया गया है. रेंके आयोग ने इन वर्गों में शिक्षा में लैंगिक भेदभाव को भी सामने रखा था. लेकिन इस अध्ययन में यह बात आई कि आवासीय विद्यालयों से शिक्षा स्तर में काफी सुधार नहीं हुआ. 

सभी राज्यों में बच्चों की शिक्षा से संबंधित निर्णयों में अभिभावकों की भागीदारी के मोर्चे पर कमी दिखी. इसकी एक वजह अभिभावकों की शिक्षा और जागरुकता का स्तर कम होना है. लेकिन असल वजह उनकी रिहाइश से स्कूलों की दूरी है. इसके बावजूद अभिभावक चाहते हैं कि उनके बेटे और बेटियां दोनों पढ़ें. अगर स्कूलों को इस समुदायों की बसावट के नजदीक ले जाया जाए तो इनके शिक्षा का स्तर सुधर सकता है.

इससे बच्चों की पढ़ाई में अभिभावकों की भागीदारी भी बढ़ेगी. इस अध्ययन में शामिल हुए अधिकांश छात्र सरकारी स्कूलों के थे. हालांकि, पूरे देश में निजी स्कूल बढ़ रहे हैं लेकिन इस अध्ययन से यह बात स्थापित होती है कि संकटग्रस्त समुदायों के बच्चे सरकारी स्कूलों में ही जा रहे हैं. ऐसे में सरकारी स्कूल तंत्र को ठीक करना बेहद जरूरी है. ये सुधार स्थानीय जरूरतों और आकांक्षाओं पर आधारित होने चाहिए.

Updated On : 15th Nov, 2017

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