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अपना धर्म खोना

धार्मिक आजादी के मामले महिलाओं का मूल अधिकार कहां ठहरता है?

 
 

विभिन्न धर्मों में कई ऐसी चीजों हैं जो महिलाओं के लिए समान नहीं कही जा सकती हैं. लेकिन जब सरकार ही नारीविरोधी हो तो ये भेदभाव और बढ़ जाते हैं.

गूलारुख गुप्ता का उदाहरण हमारे सामने है. वे पारसी हैं और और उन्होंने एक गैर-पारसी से शादी की है. उन्होंने गुजरात उच्च न्यायालय में याचिका दायर करके यह मांग की थी कि उन्हें पारसी धार्मिक कार्य करने से नहीं रोका जाए. लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत शादी के बाद उनके पति का धर्म ही उनका धर्म है. इसका मतलब यह हुआ कि अदालत ने भारतीय संविधान द्वारा उन्हें दिए गए धर्म के अधिकार से उन्हें वंचित कर दिया.

उच्च न्यायालय ने कहा कि जब तक कोई दूसरा कानून नहीं बनता तब तक महिला की धार्मिक पहचान पति के धार्मिक पहचान से ही है. अदालत ने इस निर्णय को 1954 के कानून की विचित्र व्याख्या कहा गया. 

क्योंकि स्पेशल मैरिज एक्ट आया ही इसलिए था कि अलग-अलग धर्म के पति-पत्नी कानूनी तौर पर शादी कर सकें और अपना-अपना धर्म उन्हें छोड़ना भी न पड़े. इसके जरिए 1872 के कानून को हटाया गया था. जिसके तहत दोनों पक्ष को शादी करने के लिए अपना-अपना धर्म छोड़ना पड़ता था. 1954 के कानून ने महिलाओं को अपना धर्म बरकरार रखने का अधिकार कुछ उसी तरह से दिया जिस तरह से दूसरी जाति में शादी करने से महिलाओं की जाति बरकरार रहती है. इससे व्यक्तिगत दायरे में महिलाओं को शादी की संस्था और धर्म को अलग-अलग रखने की आजादी मिली.

अब गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. संविधान पीठ उनके मामले की सुनवाई करेगी. धार्मिक मामलों में महिलाएं जिस तरह के भेदभाव का सामना करती हैं, उसके परिप्रेक्ष्य में यह कहा जा सकता है कि गुप्ता पर एक धार्मिक ट्रस्ट द्वारा पारसी धार्मिक गतिविधियों में शामिल होने पर लगाया गया प्रतिबंध एक बानगी मात्र है.

सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक के मसले पर प्रगतिशील रुख अपनाया. लेकिन हादिया मामले पर अदालत का रुख दूसरे छोर पर है. इस महिला ने अपनी इच्छा से दूसरे धर्म को अपनाकर अपनी शादी की. लेकिन केरल उच्च न्यायालय ने उसकी शादी को रद्द कर दिया और व्यस्क हादिया को उसके अभिभावकों के साथ रहने का आदेश दिया. इससे न्यायपालिक के पुरुषवादी सोच का पता चलता है.

लंबे समय से शादी और धर्म की संस्था को महिलाओं के शोषण का प्रतीक माना जा रहा है. ऐसे में न्यायपालिक की भूमिका अहम हो जाती है. गुजरात उच्च न्यायालय से जो निर्णय आया उससे न्यायपालिका पर भी सवाल उठते हैं. धर्म एक सामाजिक संस्था तो है ही लेकिन यह निजी विश्वास का भी मामला है. भारतीय संविधान भी अनुच्छेद-25 के तहत धर्म की आजादी देता है और यह सबके लिए है जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं.

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Updated On : 13th Nov, 2017

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