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आगे की ओर एक नन्हा कदम

तीन तलाक मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सफलतापूर्वक एक बड़ी बाधा को पार कर लिया है

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भारत की मुस्लिम महिलाओं के लिए यह एक छोटी सी जीत है. उन्हें खुद को और न्यापालिका को शुक्रिया अदा करने के अलावा भारतीय जनता पार्टी समेत किसी और का आभार जताने की जरूरत नहीं है. इन्हीं महिलाओं की कोशिशों की वजह से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा. अदालत ने तलाक-ए-बिद्दत यानी तुरंत तीन बार तलाक बोलकर पत्नी को तलाक देने वाली कुप्रथा को खत्म कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट में पांच तलाकशुदा महिलाओं और भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने तीन तलाक को खत्म करने की याचिका दायर की थी. लेकिन अदालत ने खुद को तलाक-ए-बिद्दत तक ही सीमित रखा. 395 पन्नों का यह निर्णय सीधा नहीं है. पांच जजों ने तीन अलग-अलग निर्णय दिए. तीन जजों न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन, यूयू ललित और कुरीयन जोसफ ने यह माना कि यह प्रथा गलता है और इसे खत्म करना चाहिए. उच्चतम न्यायालय ने 2002 में ही शमीम आरा बनाम उत्तर प्रदेश मामले में ही इसे गैरकानूनी ठहरा दिया था. आश्चर्यजनक यह है कि उस निर्णय को मीडिया, राजनीतिक दलों और सिविल सोसाइटी ने खास तवज्जो नहीं दिया.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बारीकियों पर महीनों तक चर्चा होगी. हालांकि, इसका असर मुस्लिम समाज के हर वर्ग पर नहीं पड़ेगा. क्योंकि हर वर्ग में ही एक ही तरह के रिवाज नहीं हैं. हालांकि, यह कोशिश हमेशा की जाती है कि पूरे मुस्लिम समाज को एक ही तरह से पेश किया जाए. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने जिस कुप्रथा को गलत माना है वह सिर्फ सुन्नी मुसलमानों के बीच प्रचलित था.

इस निर्णय का चिंताजनक पक्ष जेएस केहर और एस अब्दुल नजीर का अल्पमत वाला फैसला है. इन दोनों ने तलाक-ए-बिद्दत को सुन्नी मुसलमानों के पर्सनल लाॅ का हिस्सा माना और कहा कि इसे संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत बचाव हासिल है. इन लोगों ने यह भी कहा कि धर्म और पर्सनल लाॅ को वैसे ही माना जाना चाहिए जैसे इसे अपनाया जा रहा हो न कि जैसा दूसरे लोग या उसी समाज में खुद को तार्किक कहने वाले लोग कह रहे हैं. अगर यही निर्णय अंतिम तौर पर आ जाता तो फिर महिलाओं के लिए सुधार की मांग करना मुश्किल हो जाता. जजों ने यह माना कि पर्सनल लाॅ में कोई भी बदलाव न्यायपालिका को नहीं बल्कि संसद को करने का अधिकार है. जजों ने भारत सरकार को याचिककर्ताओं की मांगों को पूरा करने के लिए छह महीने के अंदर कानून बनाने को कहा. हालांकि, यह भी बाध्यकारी नहीं है. अगर संभावना होती तो भाजपा अल्पमत के निर्णय के इस पक्ष को आधार बनाकर समान नागरिक संहिता की ओर बढ़ने की कोशिश करती.

कोर्ट के आदेश के बाद आगे देखने की जरूरत है. ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई संगठन मुस्लिम महिलाओं के भेदभाव के मामले में पक्षकार रहा है. यह महत्वपूर्ण है. जब 1985 में शाहबानो मामले में सर्वोच्च अदालत ने इस तलाकशुदा महिला के गुजारे की रकम देने की जिम्मेदारी उसके पूर्व पति पर डालने का फैसला किया था तो राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में कानून बनाकर इसे पलट दिया था. उस वक्त एक बड़ा बदलाव होते-होते रह गया. महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठनों ने भी मुस्लिम महिलाओं की इस समस्या की ओर उपयुक्त ध्यान नहीं दिया. लेकिन तब से अब तक काफी कुछ बदल गया है. अब महिलाएं संगठित हुई हैं. अलग अखिल भारतीय मुस्लिम महिला पर्सनल लाॅ बोर्ड बना है. मुस्लिम महिलाएं अपने समाज के रुढ़िवादी नेतृत्व को चुनौती दे रही हैं. 

मुस्लिम महिलाओं को लैंगिक न्याय की दिशा में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पहला कदम है. जिन महिलाओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, उन्होंने सालों की हिंसा और दहेज की मांग को सामने लाया. ये ऐसे बोझ हैं जिसके तले भारत में हर वर्ग की महिलाएं दबी हुई हैं. हालांकि, यह मामला सिर्फ तलाक से जुड़ा हुआ था लेकिन मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा की घटनाएं खत्म नहीं हांेगी.

उच्चतम न्यायालय की पांच जजांे की पीठ ने बड़ी बाधा को पार कर लिया है. खास तौर पर देश की सांप्रदायिक स्थिति के संदर्भ में. इससे इस ओर चर्चा जाएगी कि मुस्लिम महिलाएं अपने पर्सनल लाॅ में और क्या बदलाव चाहती हैं.

 
Updated On : 13th Nov, 2017

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