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विश्विद्यालयों को शांत करना

सामाजिक विज्ञान शोध के लिए फंड में कटौती दूरगामी सोच की कमी को दिखाता है

 

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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने सामाजिक विज्ञान शोध के लिए फंड में कटौती करने का निर्णय लिया है। इसके खिलाफ देश भर के विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शन हुए। इनमें सामाजिक विज्ञान संकार्य के छात्रों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। पंचवर्षीय योजनाओं के खत्म होने के बाद 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत आयोग द्वारा बनाए गए कई सामाजिक विज्ञान शोध संस्थान पैसे की कमी की समस्या से जूझ रहे हैं। अब आयोग ने जो फैसला किया है उससे कई शिक्षकों, शोधकर्ताओं और छात्रों का भविष्य तो संकट में है ही साथ ही साथ उभरते हुए ज्ञान क्षेत्र के लिए भी यह बुरी खबर है।

देश के बड़े विश्वविद्यालयों के इन केंद्रों की अलग-अलग निर्भरता योजना व्यय से मिलने वाले पैसे पर है। कुछ जगहों पर तो उन्हें विश्वविद्यालय के विभाग में बदल दिया गया है। कहीं उन्हें पैसा राज्य सरकारों से मिल रहा है तो कहीं अन्य स्रोतों से। लेकिन जहां उनकी निर्भरता पूरी तरह योजनागत व्यय पर भी, वहां उन पर या तो बंद होने का या फिर छोटा किए जाने का खतरा मंडरा रहा है।

इस निर्णय का नतीजा क्या होगा, यह पिछले दिनों टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज में दिखा। यहां एडवांस सेंटर फाॅर वूमन स्टडीज, सेंटर फाॅर स्टडी और सोशल इक्सक्लूजन ऐंड इन्क्लूजिव पाॅलिसी और नोडल सेंटर आॅफ एक्सीलेंस फाॅर ह्यूमन राइट्स के कई शिक्षकों और शोधार्थियों को काम से मुक्त करने का पत्र संस्थान ने थमा दिया। लेकिन जब यह बात मीडिया में आई तो आयोग ने संस्थान को एक साल का यानी 31 मार्च, 2018 का समय विस्तार दे दिया और अधिकांश लोगों की नौकरियां बच गईं। इससे विरोध थम तो गया है लेकिन बड़ा सवाल बरकरार है कि इन संस्थानों का भविष्य क्या होगा।

हालांकि, महिला अध्ययन केंद्र कई विश्वविद्यालयों में 70 के दशक में खुले लेकिन आयोग से उन्हें 80 के दशक के मध्य से ही पैसा मिलना शुरू हुआ। लेकिन 11वीं पंचवर्षीय योजना में ऐसे विशेष केंद्रों को प्रोत्साहन देने की बात की गई थी। इस योजना के तहत स्थापित होने वाले महिला अध्ययन केंद्रों से यह उम्मीद थी कि वे विभिन्न विभागों के बीच अध्ययन का ढांचा विकसित करें, दूसरे विभागों की पढ़ाई सुधारने का दृष्टिकोण दें और नीतियों के निर्माण में सूचनाएं मुहैया करा सकें। इसमें भी दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ी महिलाओं पर अधिक जोर देने की बात की गई थी। ऐसे केंद्रों ने पिछले कुछ समय में नए शिक्षकों और छात्रों के बूते अच्छा काम किया है।

इकाॅनोमिक ऐंड पाॅलिटिकल वीकली में 15 दिसंबर, 2002 को प्रकाशित अपने एक लेख में समाजशास्त्री गोपाल गुरू ने पूछा है कि ‘सामाजिक विज्ञान कितना समतावादी है?’ उन्होंने अपने इस लेख में सांस्कृतिक अनुक्रम की बात की और सामाजिक विज्ञान क्षेत्र के अवधारणात्म जमीन के विस्तार की वकालत की। इस माहौल में ये केंद्र शुरू हुए थे और काम कर रहे थे।

इन संस्थानों ने पारंपरिक संस्थानों को कई तरह से चुनौती दी। पुणे के क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फूले महिला अध्ययन केंद्र ने एक ऐसी पद्धति विकसित की जिससे पिछड़े वर्ग के शोधार्थी सामने आएं। इसके पहले तक इस वर्ग पर शोध किया जाता था।

इन संस्थानों की शुरुआत एक ऐसे वक्त में हुई जब केंद्र सरकार के शैक्षिक संस्थानों में 2007 में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण मिला। इससे उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों में विविधता आई। नए केंद्रों ने जाति, पितृसात्मक समाज, मुख्यधारा विमर्श और सरकारी दमन जैसे विषयों को एक नया आयाम दिया। इससे छात्र समूहों के अभियानों को व्यापक विस्तार मिला। इनमें से रोहित वेमुला को न्याय दिलाने का अभियान, हाॅस्टल में लड़कियों से भेदभाव के खिलाफ पिंजरा तोड़ अभियान, जाधवपुर विश्वविद्यालय में एक महिला छात्र से दुव्र्यवहार के खिलाफ होक कोलोरोब अभियान और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मद्रास में आंबेडकर पेरियार स्टडी सर्कल की मान्यता रद्द करने से जुड़े अभियान निकले। इससे लिंग और जाति से जुड़ा विमर्श छात्रों के बीच मजबूत हुआ। इसने पहले से स्थापित छात्र संगठनों की नेतृत्व क्षमता को चुनौती दी। साथ ही दूसरे विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ एकजुटता विकसित करने में मदद की।

सामाजिक विज्ञान अध्ययन केंद्रों को एक साल के लिए दिया गया समय विस्तार एक गंभीर समस्या का अस्थाई समाधान है। सामाजिक विमर्शाें का विस्तार और शैक्षणिक संस्थानों को और अधिक बराबरी वाला बनाए जाने की प्रक्रिया दांव पर लगी हुई है। पंचवर्षीय योजनाएं खत्म भी हो जाती हैं तब भी इस शोध एजेंडे को बढ़ाया जाना चाहिए। इन केंद्रों के मौजूदगी और विस्तार से भारतीय विश्वविद्यालय और समृद्ध होंगे। क्योंकि इसमें हाशिये पर पड़े लोगों की भागीदारी और बढ़ेगी। ऐसा करके वे ज्ञानार्जन के पारंपरिक तरीके को चुनौती देंगे और चीजों को देखने का एक व्यापक नजरिया विकसित कर सकेंगे। मोटे तौर पर यही विश्वविद्यालयों और पूरे शैक्षणिक तंत्र का लक्ष्य है।

 
Updated On : 13th Nov, 2017

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