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स्वास्थ्य का अधिकार

स्वास्थ्य का अधिकार के लिए भारत अब और इंतजार नहीं कर सकता

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राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति मूलतः एक विचार पत्र होता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 इसी भूमिका में है। हालांकि, ये अपने वादों और क्रियान्वयन की कार्ययोजना को लेकर कई मामलों में नाकाम भी दिख रहा है। एक बात जो इसमें चिंताजनक है, वो यह कि स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी पर बहुत अधिक जोर दिया गया है।

प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर अलमा-अट्टा घोषणा के बाद भारत ने 1983 में पहली राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की घोषणा की थी। इसके बाद दूसरी नीति 2202 में आई। हालांकि, मृत्यु दर, उम्र प्रत्याशा और विभिन्न बीमारियों को लेकर स्थितियां कुछ सुधरी हैं। खास तौर पर 2005 की राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लागू होने के बाद। लेकिन इन मामलों में लक्ष्यों को पाया जाना अभी भी मुश्किल ही लगता है। ऐसे में नई स्वास्थ्य नीति इन लक्ष्यों को हासिल करने की तारीख बढ़ाता हुआ ही नजर आता है।

स्वास्थ्य को लेकर भारत का बजट आवंटन दुनिया में सबसे कम खर्च करने वाले देशों में हैं। 2017 में भारत ने जीडीपी का महज 1.3 फीसदी फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च किया है। इससे यह भरोसा नहीं पैदा होता कि जो लक्ष्य नीतियों में तय किए गए हैं, वे समय से पूरे हो पाएंगे। 15 साल बाद आई स्वास्थ्य नीति को कैबिनेट से मंजूरी मिल गई है। इसमें यह कहा गया है कि 2025 तक स्वास्थ्य पर जीडीपी का 2.5 फीसदी खर्च किया जाएगा। इसके अलावा राज्य 2020 तक अपने बजट का 8 फीसदी इस मद में खर्च करेंगे। इसमें यह भी कहा गया कि कुल स्वास्थ्य बजट का दो तिहाई से अधिक प्राथमिक स्वास्थ्य पर खर्च किया जाएगा। इसमें कहा गया है कि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की गारंटी सरकारी स्वास्थ्य बीमा के जरिए दी जाएगी और द्वितीयक और तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए निजी स्वास्थ्य बीमा को प्रोत्साहन दिया जाएगा। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर जोर दिया जाना स्वागतयोग्य कदम है लेकिन जीडीपी का 2.5 फीसदी खर्च करके इस लक्ष्य को पाना मुश्किल लग रहा है। क्योंकि कई विकासशील देश इस मद में इससे अधिक खर्च कर रहे हैं।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में एक अच्छी बात यह है कि इसमें सभी राज्यों में जन स्वास्थ्य प्रबंधन कैडर स्थापित करने की बात कही गई है। इसमें कई क्षेत्रों जैसे समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, नर्सिंग, अस्पताल प्रबंधन आदि क्षेत्रों के पेशेवरों को शामिल करने की बात कही गई है। इसके पहले सिर्फ मेडिकल पेशेवरों की ही ऐसी कार्यों में भूमिका देखी जाती थी। इसके अलावा एक और अच्छी बात इस नीति में यह है कि जिला अस्पतालों और जिला से निचले स्तर के अस्पतालों को ठीक करने की बात कही गई है। साथ ही कुछ जिला अस्पतालों को शैक्षणिक केंद्र में बदलने की बात भी कही गई है। इसके अलावा आयुष स्वास्थ्यकर्मियों को भी स्वास्थ्य सेवा ढांचे में जोड़ने की बात कही गई है। इसके अलावा नई नीति में डाॅक्टरों के लिए ग्रामीण पोस्टिंग को अनिवार्य बनाने और एमडी कोर्स का प्रचार-प्रसार की बात भी है। अगर इन प्रावधानों को ठीक ढंग से लागू कर दिया जाता है तो इससे प्राथमिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्थितियां काफी सुधर सकती हैं, खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में।

इस नीति में चिंता की बात यह है कि निजी क्षेत्र को स्वास्थ्य सेवाओं में शामिल करने की वकालत की गई है। नीति में स्पष्ट है कि स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पैसे करों के जरिए ही जुटाए जाएंगे लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं और बीमा खरीदने के लिए जो वरीयता क्रम बनाया गया है उसमें निजी कंपनियां भी शामिल हैं। पहली प्राथमिकता सरकारी क्षेत्र को है और दूसरी गैरलाभकारी क्षेत्र को और तीसरी निजी क्षेत्र को। निजी क्षेत्र का इस्तेमाल तब ही किया जाना चाहिए जब जानबूझकर सरकारी खर्च कम करने के लिए ऐसा नहीं किया जा रहा हो। क्योंकि सरकारी खर्च के बिना जन स्वास्थ्य सेवाएं नहीं चल सकतीं।

नई नीति के बारे में दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इसमें शिक्षा का अधिकार और भोजन का अधिकार के तर्ज पर स्वास्थ्य को अधिकार घोषित करने को लेकर कोई वादा नहीं है। 2015 के मसौदे में जिस राष्ट्रीय स्वास्थ्य अधिकार कानून को लागू कराने की बात कही गई थी, उसका नई नीति में कोई जिक्र नहीं है। इसमें यह कहा गया है कि स्वास्थ्य क्षेत्र का बुनियादी ढांचा दुरुस्त किया जाना जरूरी ताकि स्वास्थ्य का अधिकार सुनिश्चित हो सके। हालांकि, इससे स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को मौलिक अधिकार बनाने का रास्ता प्रसस्त नहीं होता। जब तक स्वास्थ्य सेवाओं को एक अधिकार के तौर पर देखा नहीं जाएगा तब तक इससे जुड़े बुनियादी ढांचे को एक स्तर तक पहुंचाने के लिए जरूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखेगी।

स्वास्थ्य के मामले में भारत थाइलैंड और श्रीलंका से न सिर्फ पीछे है बल्कि  ब्रिक्स देशों में भी सबसे पीछे हैं। ये देश स्वास्थ्य लक्ष्यों को पूरा करने के मामले में भारत से काफी आगे निकल गए हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति इन लक्ष्यों को पूरा करने में तत्परता दिखाने में नाकाम दिख रही है। स्वास्थ्य को अधिकार का दर्जा नहीं देकर यह नीति इस बात को सुनिश्चित करती दिख रही है कि भारत अभी इस मोर्चे पर और पीछे बना रहेगा।

Updated On : 13th Nov, 2017

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