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फासिवाद की संभावनाएं

फासिवाद का विरोध करने वालों के कंधे पर बड़ी जिम्मेदारियां हैं

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माक्र्सवादी यानी सीपीएम की 19 से 21 जनवरी के बीच कोलकाता में केंद्रीय समिति की बैठक हुई. इस बैठक में राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे पर चर्चा हुई और इससे वाम विचार वाले लोगों और प्रगतिशील लोगों में काफी चर्चा हुई. कई लोगों को यह लगता है कि 2019 में अगर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी फिर से लोकसभा चुनावों में कामयाबी हासिल करती है तो फासिवाद या अर्द्धफासिवाद का खतरा पैदा हो जाएगा. इस लिहाज से माकपा से यह उम्मीद की जा रही है कि वह अपना कर्तव्य निभाए. सितंबर 2016 में पार्टी में आंतरिक स्तर पर यह चर्चा चल रही है कि क्या फासिवाद के लक्षण भारत की शासन व्यवस्था में दिखने लगा है. अगर ऐसा है तो इससे निपटने के लिए क्या करना चाहिए. इस विषय पर लोगों का और मीडिया का खास ध्यान गया है.

 

पार्टी के अंदर बहुमत की राय को पूर्व महासचिव प्रकाश करात ने आवाज दी. उनके मुताबिक फासिवाद के उदय की परिस्थितियां या तो बिल्कुल नहीं हैं या फिर बेहद कमजोर स्थिति में हैं. लेकिन इसमें कोई दो मत नहीं है कि हिंदुत्व की विचारधारा पर शीर्ष स्तर से और नीचे के स्तर से हिंदुत्व ब्रिगेड द्वारा समाज को एक खास ढंग से ढालने की कोशिशें चल रही हैं. ऐसे में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता पर खतरा मंडरा रहा है. केंद्रीय समिति के अधिकांश लोगों का मानना है कि ‘नव-उदारवाद’ और ‘सांप्रदायिकता’ से संयुक्त तौर पर लड़ा जाना चाहिए. इसलिए शासक वर्ग की ओर से नव-उदारवादियों को अपने साथ बनाए रखने वाली पार्टी कांग्रेस से इस संघर्ष के लिए गठबंधन नहीं होना चाहिए.

 

दूसरे विचार का प्रतिनिधित्व पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी कर रहे हैं. इनका कहना है कि कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करने का रुख बेकार है. लेकिन केंद्रीय समिति की बैठक में जब इस पर वोटिंग हुई तो येचुरी की राय खारिज हो गई. संशोधित प्रस्ताव में कांग्रेस के साथ किसी भी समझौते या चुनावी गंठबंधन की संभावना को समाप्त कर दिया है. अब इसमें बदलाव तब ही हो सकता है कि जब अप्रैल में होने वाले पार्टी कांग्रेस में इस फैसले को पलट दिया जाए.

 

1920 के दशक और 1930 के दशक में जर्मनी के वाम दलों के अनुभवों को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत में भी सबसे पहले वाम दलों को एक साथ एकजुट होना चाहिए. ताकि अर्द्धफासिवाद का विरोध कर सकें. संसदीय वाम दलों के अलावा रैडिकल वाम दलों और समाजवादियों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए. कम्युनिस्ट वाम दलों को खुद को सबसे बेहतर मानने की सोच छोड़कर समाजवादी परंपरा की विविधता को स्वीकार करना चाहिए. इस संयुक्त मोर्चे को नव-उदारवाद विरोधी एजेंडा अपनाना चाहिए. अगर कोई भी ऐसा मोर्चा बनता है तो उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. वर्ग के आधार पर धु्रवीकरण होगा और नव-उदारवादी चुनावी फायदे के लिए पैसे का नंगा नाच शुरू कर देंगे.

 

यह निर्णय संयुक्त मोर्चा का होना चाहिए कि कब वह उदारवादी पूंजीवादी पार्टी के साथ लोकप्रिय मोर्चा के लिए गठबंधन करेगा. इसे ही यह निर्णय भी लेना होगा कि राष्ट्रीय मोर्चे के लिए कब दक्षिणपंथी पार्टियों और सरकारों का साथ लेना है. संयुक्त मोर्चा को भेदभाव और खास तौर पर मुस्लिम समाज के प्रति हो रहे भेदभाव का मुद्दा उठाना चाहिए. इसे धर्म के आधार पर नहीं बल्कि इस आधार पर उठाया जाना चाहिए कि इनमें से अधिकांश लोग शोषित वर्ग और जातियों से दूसरे धर्म में आए हैं. लोकप्रिय और राष्ट्रीय मोर्चे को भी इन बातों को उठाना चाहिए.

 

अभी कई ऐसे मुस्लिम नौजवान हैं जिन्हें पुलिस और न्याय तंत्र द्वारा सताया जा रहा है. सच्चाई तो यह है कि हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादी सरकार के साथ मिलकर मुस्लिम समाज के लोगों को दमन करने में जुटे हैं. पुलिस और अदालतें इन लोगों को सुरक्षा और न्याय देने में नाकाम रहे हैं. इस वजह से इस वर्ग के ठीकठाक लोगों का इन तंत्रों से भरोसा उठ रहा है. जो भी संयुक्त और लोकप्रिय मोर्चा बनेगा उसे इन शोषित मुसलमानों को अपने साथ लाना चाहिए. इसके अलावा उन लोगों को भी अपने साथ लाना चाहिए जिन्हें हिंदुत्वादी राष्ट्रवादियों ने तंग किया है.

 

फासिवाद और अर्द्धफासिवाद की जड़ों को तलाशन होगा. इसके सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक वजहों को तलाशकर इन्हें दूर करने की कोशिशें करनी चाहिए. ऐसा होने पर ही लोकप्रिय या राष्ट्रीय मोर्चा आकार ले पाएगा और लोगों को अपने साथ जोड़ पाएगा. लोगों को यह भी समझना चाहिए कि संघ परिवार का राजनीतिक दल अभी सत्ता में है. अगर यह 2019 में फिर से सत्ता में आती है हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादी हिंदू राष्ट्र का लक्ष्य हासिल करने के लिए उदार-राजनीतिक लोकतंत्र को छोड़कर दूसरे तरीके भी अपना सकते हैं.

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